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दीपावली पर घर ही नहीं, जीवन भी रोशन हो

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दूरियाँ मिटाएँ, संवाद बढ़ाएँ और खुशियों मनाएँ (प्रवीण कक्कड़) दीपों की रोशनी से दिशाएँ जगमगाती हैं, प्रेम और विश्वास से ज़िंदगियाँ मुस्कुराती हैं  दीपावली पर हम घरों की सफाई करते हैं, लेकिन क्या कभी मन में जमा अहंकार, रिश्तों में आई दूरियाँ और व्यवहार में बढ़ती कड़वाहट को साफ करने का विचार करते हैं? आज घर बड़े हो रहे हैं, लेकिन परिवार छोटे; संपर्क बढ़ रहे हैं, लेकिन संवाद घट रहे हैं। सोशल मीडिया पर हजारों शुभकामनाएँ भेजने वाले हम, कभी अपने ही घर में बैठे व्यक्ति का हाल पूछना भूल जाते हैं। आर्थिक समृद्धि की दौड़ में भावनात्मक संपन्नता कहीं पीछे छूट रही है। ऐसे समय में दीपावली केवल उत्सव नहीं, आत्ममंथन का अवसर है। क्यों न इस बार घर के साथ अपने विचार, व्यवहार और संबंधों को भी रोशन करें? परंपरा में छिपा जीवन का दर्शन दीपावली भगवान श्रीराम के अयोध्या लौटने की स्मृति से जुड़ी है। जैन परंपरा में भगवान महावीर का निर्वाण और सिख परंपरा में बंदी छोड़ दिवस भी इसी उत्सव से जुड़े हैं। इन परंपराओं का साझा संदेश है अंधकार पर प्रकाश और बंधन पर मुक्ति। धनतेरस स्वास्थ्य एवं समृद्धि, नरक चतुर्दशी बुरा...

मध्य प्रदेश @70 : गौरव की विरासत, भविष्य की नई उड़ान

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बड़ा सवाल : अगली पीढ़ी को हम कैसा मध्य प्रदेश सौंपेंगे? (प्रवीण कक्कड़) मध्य प्रदेश केवल भारत के मानचित्र का हृदय नहीं, बल्कि करोड़ों सपनों, संघर्षों और संभावनाओं की जीवंत धड़कन है। यहाँ नर्मदा की अविरल धारा में जीवन है, महाकाल की आस्था में विश्वास है, साँची की शांति में संस्कृति है और खेतों में पसीना बहाते किसान के परिश्रम में समृद्धि की उम्मीद। यह वह प्रदेश है, जहाँ गौरवशाली अतीत हमारी पहचान है और नई पीढ़ी के सपने हमारे भविष्य की दिशा तय कर रहे हैं। 1 नवंबर 1956 को अस्तित्व में आया मध्य प्रदेश आज अपनी स्थापना की 70वीं वर्षगाँठ मना रहा है। सात दशकों में हमने विकास की अनेक उपलब्धियाँ हासिल कीं, चुनौतियों का सामना किया और नई संभावनाओं के द्वार खोले। लेकिन आज अवसर केवल उपलब्धियों का उत्सव मनाने का नहीं, बल्कि भविष्य की दिशा तय करने का भी है। क्योंकि असली प्रश्न यह नहीं कि पिछले 70 वर्षों में हमने क्या पाया, बल्कि यह है कि आने वाली पीढ़ियों के लिए हम कैसा मध्य प्रदेश बना रहे हैं? विरासत से आगे, संभावनाओं का प्रदेश मालवा की जीवंतता, निमाड़ की आत्मीयता, बुंदेलखंड का स्वाभिमान, बघेलखंड की सा...

चाँद से सीखिए: हर आकार में पूर्ण होने की कला

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शरद पूर्णिमा आज:  चंद्रमा  की  बदलती कलाओं में छिपा जीवन का अनमोल संदेश (प्रवीण कक्कड़) क्या कभी आपने चाँद से पूछा है कि वह हर रात अपना आकार क्यों बदलता है? कभी पूर्णिमा की रात अपनी चाँदनी से आकाश को आलोकित करता है, कभी आधा होकर भी आकर्षित करता है, तो कभी पतली-सी रेखा बनकर क्षितिज पर मुस्कुराता है। अमावस्या की रात हमारी आँखों से ओझल भी हो जाता है। लेकिन क्या चाँद अपने घटते आकार से निराश होता है? क्या वह पूर्णिमा की प्रतीक्षा में अपना महत्व खो देता है? नहीं! प्रकृति का यह अद्भुत शिक्षक बिना कुछ कहे जीवन का एक गहरा सत्य समझाता है - पूर्णता किसी एक अवस्था में पहुँचने का नाम नहीं, बल्कि अपनी हर अवस्था में उपलब्ध संभावनाओं को सार्थक बनाने की कला है।  चाँद कभी अधूरा नहीं होता, फिर हम खुद को अधूरा क्यों समझते हैं? जीवन में घटना-बढ़ना प्रकृति का नियम है, लेकिन हर अवस्था की अपनी विशेषता, अपना सामर्थ्य और अपनी उपयोगिता होती है। सफलता किसी आदर्श परिस्थिति या भविष्य की पूर्णता की प्रतीक्षा में नहीं, बल्कि वर्तमान को सार्थक बनाने में है। आकार बदलता है, अस्तित्व नहीं भारतीय पंचांग ...

मानसून की विदाई, जलसंकट की दस्तक!

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अक्टूबर में टैंकर, तो मई-जून में क्या होगा? ( प्रवीण कक्कड़) कभी सोचा है कि जिस शहर ने स्वच्छता में देश को रास्ता दिखाया , वही शहर आने वाले महीनों में पानी की एक-एक बूंद के लिए संघर्ष करने लगे तो क्या होगा ? जिस इंदौर में अक्टूबर तक बारिश की यादें ताजा रहती थीं , वहां मानसून विदा होते ही टैंकरों की जरूरत पड़ने लगी है। कहीं बोरवेल जवाब दे रहे हैं , कहीं तालाबों का जलस्तर चिंता बढ़ा रहा है। सवाल केवल इतना नहीं कि इस बार बारिश कम क्यों हुई ? बड़ा सवाल यह है कि क्या हम आने वाली गर्मियों के लिए तैयार हैं ? क्योंकि जलसंकट अचानक नहीं आता , पहले संकेत देता है और फिर हमारी लापरवाही की कीमत वसूलता है। इस वर्ष इंदौर में मानसूनी बारिश लगभग 590 मिलीमीटर दर्ज की गई , जबकि सामान्य स्तर करीब 929 मिलीमीटर है। अर्थात लगभग 37 प्रतिशत की कमी। एक अक्टूबर की रिपोर्ट में इसे पिछले 26 वर्षों का दूसरा सबसे सूखा मानसून बताया गया। यह केवल मौसम का उतार-चढ़ाव नहीं , बल्कि शहर के जल प्रबंधन के लिए गंभीर चेतावनी है। आंकड़े वर्षा की अनिश्चितता दर्शाते हैं। इस समय अब हमें यह समझना होगा कि जल प्रबंधन केवल अच्छी बा...

नवरात्रि : माँ की “आराधना” से “शक्ति” की पहचान तक

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नौ दिनों की साधना, नौ संकल्प और जीवन को नई दिशा देने का अवसर (प्रवीण कक्कड़) कभी सोचा है कि जिस शक्ति के सामने हम सिर झुकाते हैं, यदि उसका एक अंश भी अपने जीवन में उतार लें, तो हमारी दुनिया कितनी बदल सकती है? हम माँ दुर्गा से साहस माँगते हैं, लेकिन अपने डर से लड़ने में हिचकते हैं। सुख-समृद्धि की प्रार्थना करते हैं, लेकिन अपने विचारों को समृद्ध बनाना भूल जाते हैं। जीवन के संकट दूर करने की कामना करते हैं, लेकिन अपनी कमजोरियों पर विजय पाने का प्रयास नहीं करते। शायद नवरात्रि का सबसे बड़ा संदेश यही है कि जिस शक्ति को हम मंदिरों में खोजते हैं, उसका प्रकाश हमारे भीतर भी मौजूद है। आवश्यकता केवल उसे पहचानने और जागृत करने की है। आज से शारदीय नवरात्रि का पावन पर्व प्रारंभ हो रहा है। घरों में घटस्थापना होगी, मंदिरों में आरती गूँजेगी, उपवास और साधना का क्रम शुरू होगा। वातावरण में श्रद्धा, उत्साह और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होगा। लेकिन इन नौ दिनों की सबसे सार्थक उपलब्धि क्या होगी? क्या केवल विधि-विधान से पूजा संपन्न कर लेना पर्याप्त है, या माँ की आराधना हमें अपने भीतर कुछ बदलने की प्रेरणा भी देती है? ...

श्राद्ध: स्मृतियों से आगे, विरासत तक

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क्या हमने अपने पूर्वजों के आदर्शों को अपनाया है (प्रवीण कक्कड़) श्राद्ध पक्ष का समय चल रहा है। सभी घरों में पूर्वजों को याद किया जा रहा है और उनकी स्मृति में दान-धर्म तथा भोजन के आयोजन हो रहे हैं लेकिन इन सबके बीच मेरे मन में एक सवाल भी है - क्या हम अपने पूर्वजों के आदर्शों और उनकी अच्छी बातों को सचमुच अपना पाए हैं? क्या उनकी स्मृति में भोजन कराने और दान देने के साथ-साथ हमने उनके जीवन-मूल्यों को अपने व्यवहार में जगह दी है? श्राद्ध पक्ष में ये सवाल केवल परंपरा निभाने के नहीं, अपने भीतर झाँकने के भी हैं। श्राद्ध हमारे पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर है। यह उन लोगों को याद करने का समय है, जिनके श्रम, संस्कार और फैसलों ने हमारे लिए जीवन की राह बनाई। लेकिन स्मृति तभी सार्थक होती है, जब वह हमारे वर्तमान को दिशा दे। तर्पण में अर्पित जल की तरह उनके अच्छे विचार भी हमारे आचरण में उतरें, तभी यह जुड़ाव अगली पीढ़ी तक पहुँचेगा। कृतज्ञता का अर्थ केवल कर्मकांड नहीं श्राद्ध पक्ष में श्रद्धा से किया गया भोजन, दान और तर्पण हमारी परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इनका अपना आध्यात्मिक और भावन...

पर्यटन: रास्ते जो हमें जीवन जीना सिखाते हैं

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घूमना सिर्फ़ जगह बदलना नहीं, नज़रिया बदलना है विश्व पर्यटन दिवस पर विशेष (प्रवीण कक्कड़) किसी अनजान शहर में रास्ता भटक जाना कभी-कभी जीवन का सबसे अच्छा सबक बन जाता है। हम किसी से दिशा पूछते हैं, अपनी योजना बदलते हैं और फिर उस जगह तक पहुँचते हैं, जिसे शायद सीधे रास्ते से कभी देख ही नहीं पाते। यात्रा का यही सौंदर्य है। वह हमें मंज़िल तक पहुँचाती है, लेकिन रास्ते में थोड़ा बदल भी देती है। 27 सितंबर को विश्व पर्यटन दिवस है। पर्यटन की चर्चा प्रायः सुंदर स्थलों, सुविधाओं और तस्वीरों तक सिमट जाती है। जबकि इसका सबसे गहरा प्रभाव यात्री के भीतर होता है। घर से निकलते समय हम अपने साथ अपनी आदतें, धारणाएँ और सोच लेकर चलते हैं। लौटते समय सामान लगभग उतना ही होता है, पर अनुभव कहीं अधिक। हमने कुछ नया देखा होता है, किसी अनजान व्यक्ति से बात की होती है और शायद अपने बारे में भी कुछ ऐसा जाना होता है जो रोज़ की दिनचर्या में कभी सामने नहीं आता। विकल्प खोजना हमें बढ़ाता है आगे यात्रा की पहली सीख है - सब कुछ हमारी इच्छा के अनुसार नहीं होगा। कभी मौसम बदल जाता है, कभी गाड़ी देर से आती है, तो कभी तय रास्ता बंद मिलत...