प्रक्रिया और परिणाम के बीच फंसा आधी आबादी का लोकतंत्र
संसद की दहलीज़ पर लोकतंत्र की परिपक्वता की परीक्षा जनगणना और परिसीमन से परे, अब इच्छाशक्ति की परीक्षा (प्रवीण कक्कड़) “महिला आरक्षण किसी सरकार या विपक्ष की जीत-हार नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता की परीक्षा है।” इतिहास की तारीखें केवल कैलेंडर के पन्ने नहीं होतीं, वे समाज की आकांक्षाओं का आईना होती हैं। 17 अप्रैल 2026 को संसद के पटल पर महिला आरक्षण की नियमावली और परिसीमन की शर्तों को लेकर जो गहमागहमी और विधायी गतिरोध देखने को मिला, उसने एक बार फिर इस विमर्श को देश के केंद्र में ला खड़ा किया है कि आधी आबादी का हक अब केवल कागजी कानूनों की नहीं, बल्कि तुरंत और ठोस क्रियान्वयन की प्रतीक्षा में है। यह प्रश्न अब केवल जनगणना और परिसीमन की तकनीकी गणनाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारी राजनैतिक इच्छाशक्ति की वह परीक्षा है जो तय करेगी कि हम प्रतीकों से आगे बढ़कर वास्तविक हक देने के लिए कितने तैयार हैं। हाल के वर्षों की घटनाएं हमें यह याद दिलाती हैं कि महिला आरक्षण का प्रश्न केवल एक विधेयक या कानून तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस अधूरे संकल्प का प्रतीक है, जिसे देश की करोड़ों ...