भगोरिया: मिट्टी की महक से सजा सांस्कृतिक कुंभ
जहाँ 'पान' और 'गुलाल' से रची जाती है प्रेम की इबारत (प्रवीण कक्कड़) "संस्कृति वो जड़ है जो हमें तूफानों में भी खड़ा रखती है, और उत्सव वो टहनी है जिस पर खुशियों के फूल खिलते हैं।" फाल्गुन की हवाओं में जब पलाश के सुर्ख फूलों की मादक गंध घुलने लगती है और खेतों में गेहूँ की बालियाँ सुनहरी होकर झूमने लगती हैं, तब आदिवासी क्षेत्रों की पहाड़ियों में एक अलग ही संगीत गूँजने लगता है। यह संगीत है—भगोरिया का। भगोरिया केवल एक लोक-उत्सव नहीं है; यह मालवा और निमाड़ के आदिवासी समाज के स्वाभिमान, उनकी सादगी और प्रकृति के प्रति उनके अगाध प्रेम का जीवंत घोषणापत्र है। यह उत्सव बताता है कि दुनिया चाहे कितनी भी आधुनिक क्यों न हो जाए, अपनी जड़ों की ओर लौटने का आनंद ही कुछ और है। परंपरा और आधुनिकता का द्वंद्व आज के दौर में जब हम भगोरिया को देखते हैं, तो एक तरफ पारंपरिक मांदल की थाप है और दूसरी तरफ आधुनिकता का शोर। करीब चार दशक पहले मेरी पुलिस विभाग की पहली पोस्टिंग यहीं हुई थी, तब से अब तक परिदृश्य बहुत बदला है। जहाँ कभी प्रकृति की प्रधानता होती थी, वहाँ अब बाजारवाद का रंग ...