प्यास की दहलीज पर भविष्य: क्या पानी के लिए ज़मीन भी हाथ खड़े कर रही है?
'डे ज़ीरो' की आहट: एल-नीनो का दंश और प्रकृति का प्रकोप (प्रवीण कक्कड़) “पानी केवल एक संसाधन नहीं, बल्कि सभ्यता की सांस है। जिस दिन यह सांस टूटेगी, विकास के सारे दावे धूल बन जाएंगे।” हम अक्सर कहते हैं कि मौसम बदल गया है, गर्मियां अब पहले जैसी नहीं रहीं। पारा 45-46 डिग्री के पार पहुंचने लगा है, हवा में तपिश बढ़ गई है और प्रकृति के इस उग्र प्रकोप के सामने भर्ती का धैर्य जैसे टूटता जा रहा है। वैश्विक स्तर पर सक्रिय हुए एल-नीनो के दंश ने हमारे पूरे मौसम चक्र को बिगाड़ कर रख दिया है, लेकिन इस नाराजगी का सबसे भयावह चेहरा सिर्फ झुलसाती लू नहीं है। असली डर उस खाली बर्तन और हांफते ट्यूबवेल का है, जो एक बूंद पानी के लिए चीख रहे हैं। जल संकट और 'डे ज़ीरो' की आहट अब कोई दूर की आशंका नहीं, बल्कि हमारे दरवाज़े पर खड़ी वर्तमान की सबसे कठोर सच्चाई है। हालात इतने विकराल हैं कि जिन शहरों को कभी “वाटर सरप्लस” कहकर सराहा जाता था, आज वहीं टैंकरों की अंतहीन कतारें और पानी के लिए संघर्ष करती पथरीली आंखें दिखाई दे रही हैं। ऐसा लगता है मानो सचमुच पानी देने से अब इस ज़मीन ने भी अपने हाथ खड़े ...