पहले मुफ्त की लत, अब नियमों का जाल
चर्चा, चार्ज और चुनौती : क्या देश में UPI क्रांति का 'हनीमून पीरियड' खत्म हो चुका है? प्रवीण कक्कड़ सुबह आँख खुलते ही दूध का पैकेट लिया QR कोड स्कैन किया। नुक्कड़ पर चाय पी QR स्कैन किया। दोपहर में सब्जी खरीदी, गाड़ी में पेट्रोल भरवाया, रेस्तरां में खाना खाया या रात को ऑनलाइन शॉपिंग की, बस जेब से मोबाइल निकाला, पलक झपकते ही 'बीप' की आवाज आई और भुगतान हो गया।हालत यह है कि दिन के अंत में जब आप वॉलेट खोलते हैं, तो गांधी जी की तस्वीरों वाले नोट जस के तस मुस्कुराते मिलते हैं, जबकि आपकी जेब से हजारों रुपये का डिजिटल लेन-देन हो चुका होता है। जिस यूपीआई ने हमारी उंगलियों को बिना सोचे-समझे खर्च करने की ऐसी जादुई आदत लगा दी... आज वही यूपीआई अचानक नियमों, चार्जेस और बहसों के एक अजीब चक्रव्यूह में उलझ गया है। आखिर मुफ्त क्रांति के दावों के बीच अचानक यह 'चर्चा, चार्ज और चुनौती' का दौर क्यों शुरू हुआ? आइए समझते हैं इस पूरे खेल के पीछे का सच। भारत की जेब कब मोबाइल में समा गई, हमें पता ही नहीं चला लेकिन अब इसी UPI को लेकर देश में नई बहस छिड़ी है। केंद्र सरकार ने 15 सितंबर को...