संदेश

नवरात्रि : माँ की “आराधना” से “शक्ति” की पहचान तक

चित्र
नौ दिनों की साधना, नौ संकल्प और जीवन को नई दिशा देने का अवसर (प्रवीण कक्कड़) कभी सोचा है कि जिस शक्ति के सामने हम सिर झुकाते हैं, यदि उसका एक अंश भी अपने जीवन में उतार लें, तो हमारी दुनिया कितनी बदल सकती है? हम माँ दुर्गा से साहस माँगते हैं, लेकिन अपने डर से लड़ने में हिचकते हैं। सुख-समृद्धि की प्रार्थना करते हैं, लेकिन अपने विचारों को समृद्ध बनाना भूल जाते हैं। जीवन के संकट दूर करने की कामना करते हैं, लेकिन अपनी कमजोरियों पर विजय पाने का प्रयास नहीं करते। शायद नवरात्रि का सबसे बड़ा संदेश यही है कि जिस शक्ति को हम मंदिरों में खोजते हैं, उसका प्रकाश हमारे भीतर भी मौजूद है। आवश्यकता केवल उसे पहचानने और जागृत करने की है। आज से शारदीय नवरात्रि का पावन पर्व प्रारंभ हो रहा है। घरों में घटस्थापना होगी, मंदिरों में आरती गूँजेगी, उपवास और साधना का क्रम शुरू होगा। वातावरण में श्रद्धा, उत्साह और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होगा। लेकिन इन नौ दिनों की सबसे सार्थक उपलब्धि क्या होगी? क्या केवल विधि-विधान से पूजा संपन्न कर लेना पर्याप्त है, या माँ की आराधना हमें अपने भीतर कुछ बदलने की प्रेरणा भी देती है? ...

श्राद्ध: स्मृतियों से आगे, विरासत तक

चित्र
क्या हमने अपने पूर्वजों के आदर्शों को अपनाया है (प्रवीण कक्कड़) श्राद्ध पक्ष का समय चल रहा है। सभी घरों में पूर्वजों को याद किया जा रहा है और उनकी स्मृति में दान-धर्म तथा भोजन के आयोजन हो रहे हैं लेकिन इन सबके बीच मेरे मन में एक सवाल भी है - क्या हम अपने पूर्वजों के आदर्शों और उनकी अच्छी बातों को सचमुच अपना पाए हैं? क्या उनकी स्मृति में भोजन कराने और दान देने के साथ-साथ हमने उनके जीवन-मूल्यों को अपने व्यवहार में जगह दी है? श्राद्ध पक्ष में ये सवाल केवल परंपरा निभाने के नहीं, अपने भीतर झाँकने के भी हैं। श्राद्ध हमारे पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर है। यह उन लोगों को याद करने का समय है, जिनके श्रम, संस्कार और फैसलों ने हमारे लिए जीवन की राह बनाई। लेकिन स्मृति तभी सार्थक होती है, जब वह हमारे वर्तमान को दिशा दे। तर्पण में अर्पित जल की तरह उनके अच्छे विचार भी हमारे आचरण में उतरें, तभी यह जुड़ाव अगली पीढ़ी तक पहुँचेगा। कृतज्ञता का अर्थ केवल कर्मकांड नहीं श्राद्ध पक्ष में श्रद्धा से किया गया भोजन, दान और तर्पण हमारी परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इनका अपना आध्यात्मिक और भावन...

पर्यटन: रास्ते जो हमें जीवन जीना सिखाते हैं

चित्र
घूमना सिर्फ़ जगह बदलना नहीं, नज़रिया बदलना है विश्व पर्यटन दिवस पर विशेष (प्रवीण कक्कड़) किसी अनजान शहर में रास्ता भटक जाना कभी-कभी जीवन का सबसे अच्छा सबक बन जाता है। हम किसी से दिशा पूछते हैं, अपनी योजना बदलते हैं और फिर उस जगह तक पहुँचते हैं, जिसे शायद सीधे रास्ते से कभी देख ही नहीं पाते। यात्रा का यही सौंदर्य है। वह हमें मंज़िल तक पहुँचाती है, लेकिन रास्ते में थोड़ा बदल भी देती है। 27 सितंबर को विश्व पर्यटन दिवस है। पर्यटन की चर्चा प्रायः सुंदर स्थलों, सुविधाओं और तस्वीरों तक सिमट जाती है। जबकि इसका सबसे गहरा प्रभाव यात्री के भीतर होता है। घर से निकलते समय हम अपने साथ अपनी आदतें, धारणाएँ और सोच लेकर चलते हैं। लौटते समय सामान लगभग उतना ही होता है, पर अनुभव कहीं अधिक। हमने कुछ नया देखा होता है, किसी अनजान व्यक्ति से बात की होती है और शायद अपने बारे में भी कुछ ऐसा जाना होता है जो रोज़ की दिनचर्या में कभी सामने नहीं आता। विकल्प खोजना हमें बढ़ाता है आगे यात्रा की पहली सीख है - सब कुछ हमारी इच्छा के अनुसार नहीं होगा। कभी मौसम बदल जाता है, कभी गाड़ी देर से आती है, तो कभी तय रास्ता बंद मिलत...

पहले मुफ्त की लत, अब नियमों का जाल

चित्र
चर्चा, चार्ज और चुनौती : क्या देश में UPI क्रांति का 'हनीमून पीरियड' खत्म हो चुका है?   प्रवीण कक्कड़ सुबह आँख खुलते ही दूध का पैकेट लिया QR कोड स्कैन किया। नुक्कड़ पर चाय पी QR स्कैन किया। दोपहर में सब्जी खरीदी, गाड़ी में पेट्रोल भरवाया, रेस्तरां में खाना खाया या रात को ऑनलाइन शॉपिंग की, बस जेब से मोबाइल निकाला, पलक झपकते ही 'बीप' की आवाज आई और भुगतान हो गया।हालत यह है कि दिन के अंत में जब आप वॉलेट खोलते हैं, तो गांधी जी की तस्वीरों वाले नोट जस के तस मुस्कुराते मिलते हैं, जबकि आपकी जेब से हजारों रुपये का डिजिटल लेन-देन हो चुका होता है। जिस यूपीआई ने हमारी उंगलियों को बिना सोचे-समझे खर्च करने की ऐसी जादुई आदत लगा दी... आज वही यूपीआई अचानक नियमों, चार्जेस और बहसों के एक अजीब चक्रव्यूह में उलझ गया है। आखिर मुफ्त क्रांति के दावों के बीच अचानक यह 'चर्चा, चार्ज और चुनौती' का दौर क्यों शुरू हुआ? आइए समझते हैं इस पूरे खेल के पीछे का सच। भारत की जेब कब मोबाइल में समा गई, हमें पता ही नहीं चला लेकिन अब इसी UPI को लेकर देश में नई बहस छिड़ी है। केंद्र सरकार ने 15 सितंबर को...

विघ्नहर्ता के चार वरदान, जो माँगने नहीं, अपनाने हैं

चित्र
श्रीगणेश से सीखिये सुनना, चुनना, बदलना और आगे बढ़ना  (प्रवीण कक्कड़) गणेश चतुर्थी पर हम भगवान श्री गणेश से सुख, समृद्धि, बुद्धि और विघ्नों से मुक्ति का आशीर्वाद माँगते हैं लेकिन इस बार एक प्रश्न स्वयं से भी पूछिए, जिस विघ्नहर्ता को हम अपने जीवन की बाधाएँ दूर करने के लिए पूजते हैं, क्या हमने कभी यह समझने की कोशिश की कि उनका स्वरूप हमें स्वयं बाधाओं से निपटने की कितनी बड़ी कला सिखाता है? श्री गणेश केवल आराधना के देवता नहीं, जीवन-प्रबंधन की अद्भुत प्रेरणा भी हैं। उनका स्वरूप मानो कहता है कि जीवन में हर समस्या के समाधान के लिए चमत्कार की प्रतीक्षा मत कीजिए, अपने भीतर सही गुण विकसित कीजिए। संयोग से पर्व है चतुर्थी का, इसलिए इस गणेश चतुर्थी पर विघ्नहर्ता से जीवन के चार सूत्र लेते हैं। ये चार वरदान ऐसे हैं, जिन्हें माँगना नहीं, अपनाना है। पहला सूत्र - शोर के युग में ‘सुनना’ सीखिए गणेशजी के विशाल कान हमें सबसे पहली और आज शायद सबसे जरूरी सीख देते हैं - बोलने से पहले सुनिए। आज हमारे पास अभिव्यक्ति के जितने साधन हैं, शायद सुनने का धैर्य उतना ही कम हुआ है। सोशल मीडिया पर हर व्यक्ति कुछ कहना चाह...

पीढ़ियाँ बदलती हैं, शिक्षकों की जिम्मेदारी नहीं

चित्र
Gen-Z और Gen-Alpha - नई पीढ़ी को दिशा देने की नई चुनौतियां (प्रवीण कक्कड़) शिक्षक साधारण नहीं होते, क्योंकि उनके सामने केवल विद्यार्थी नहीं, देश और समाज का आने वाला समय बैठा होता है। आज जिन बच्चों की सोच और व्यक्तित्व को वे आकार दे रहे हैं, कल वही परिवार, समाज और संस्थाओं की जिम्मेदारी संभालेंगे। उन्हीं में भविष्य के डॉक्टर, वैज्ञानिक, उद्यमी, अधिकारी, शिक्षक और जनप्रतिनिधि होंगे। इसलिए शिक्षक का प्रभाव एक विद्यार्थी तक सीमित नहीं रहता, वह उसके माध्यम से अगली पीढ़ी तक पहुँचता है। समय बदलता है, तकनीक बदलती है, पढ़ने-पढ़ाने के तरीके बदलते हैं और पीढ़ियाँ भी बदल जाती हैं, लेकिन शिक्षकों की जिम्मेदारी वही रहती है - नई पीढ़ी को अपनी क्षमताओं का श्रेष्ठ उपयोग करना सिखाना और सही दिशा देना। 2026 का शिक्षक दिवस इस जिम्मेदारी को नए संदर्भ में देखने का अवसर है। Gen-Z अब समाज और कार्यक्षेत्र में अपनी प्रभावी उपस्थिति दर्ज करा रही है और उसके पीछे Gen-Alpha तेजी से तैयार हो रही है। यह पीढ़ी इंटरनेट, स्मार्टफोन, सोशल मीडिया, एल्गोरिदम और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के बीच बड़ी हुई है। उसके पास जानकारी भी ...

कंक्रीट का विस्तार और प्रकृति का अनुशासन

चित्र
नेपाल की चेतावनी, भारत के लिए सबक  (प्रवीण कक्कड़) “विकास रोकना समाधान नहीं, विकास का भूगोल समझना और उसका सम्मान करना ही स्थायी समाधान है।” नेपाल में आई हालिया विनाशकारी बाढ़ को केवल पड़ोसी देश की मौसमी त्रासदी मानकर आगे बढ़ जाना गंभीर भूल होगी। यह हिमालय से आया वह स्पष्ट संदेश है, जिसे भारत के संवेदनशील पर्वतीय राज्यों से लेकर तेजी से फैलते आधुनिक महानगरों तक पढ़ा जाना चाहिए। संदेश सीधा है, प्रकृति विकास की विरोधी नहीं है, लेकिन उसके प्राकृतिक जलमार्गों को अवरुद्ध करके खड़ा किया गया विकास  कभी पूरी तरह सुरक्षित नहीं हो सकता। हिमालयी संकट और साझा चेतावनी 26 अगस्त को नेपाल के सीमावर्ती रासुवा क्षेत्र में आई विनाशकारी फ्लैश फ्लड ने भोटे कोशी और त्रिशूली नदी तंत्र को विकराल बना दिया। प्रारंभिक वैज्ञानिक आकलन ऊंचाई वाले क्षेत्र में बर्फ और चट्टानों के बड़े पैमाने पर धंसाव की ओर संकेत करते हैं। इस घटना ने हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियरों, ग्लेशियल झीलों और उनसे जुड़े GLOF यानी ‘ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड’ जैसे खतरों को फिर गंभीर चर्चा के केंद्र में ला दिया है। चिंता इसलिए भी बड़ी ह...