चाँद से सीखिए: हर आकार में पूर्ण होने की कला
शरद पूर्णिमा आज: चंद्रमा की बदलती कलाओं में छिपा जीवन का अनमोल संदेश (प्रवीण कक्कड़) क्या कभी आपने चाँद से पूछा है कि वह हर रात अपना आकार क्यों बदलता है? कभी पूर्णिमा की रात अपनी चाँदनी से आकाश को आलोकित करता है, कभी आधा होकर भी आकर्षित करता है, तो कभी पतली-सी रेखा बनकर क्षितिज पर मुस्कुराता है। अमावस्या की रात हमारी आँखों से ओझल भी हो जाता है। लेकिन क्या चाँद अपने घटते आकार से निराश होता है? क्या वह पूर्णिमा की प्रतीक्षा में अपना महत्व खो देता है? नहीं! प्रकृति का यह अद्भुत शिक्षक बिना कुछ कहे जीवन का एक गहरा सत्य समझाता है - पूर्णता किसी एक अवस्था में पहुँचने का नाम नहीं, बल्कि अपनी हर अवस्था में उपलब्ध संभावनाओं को सार्थक बनाने की कला है। चाँद कभी अधूरा नहीं होता, फिर हम खुद को अधूरा क्यों समझते हैं? जीवन में घटना-बढ़ना प्रकृति का नियम है, लेकिन हर अवस्था की अपनी विशेषता, अपना सामर्थ्य और अपनी उपयोगिता होती है। सफलता किसी आदर्श परिस्थिति या भविष्य की पूर्णता की प्रतीक्षा में नहीं, बल्कि वर्तमान को सार्थक बनाने में है। आकार बदलता है, अस्तित्व नहीं भारतीय पंचांग ...