कंक्रीट का कुरुक्षेत्र: क्या हम कुदरत से जंग हार रहे हैं?
आसमान से बरसती आग और ज़मीन पर एक चिंतन (प्रवीण कक्कड़) सूरज की तपिश अब केवल चुभ नहीं रही, बल्कि झुलसाने लगी है। देश के अधिकांश हिस्सों में दोपहर का सन्नाटा किसी अघोषित कर्फ्यू जैसा अहसास कराता है, सड़कों पर रफ्तार थम-सी गई है और पेड़ों की छांव भी जैसे राहत देने में असमर्थ दिखती है। यह केवल एक तपता हुआ दिन नहीं, बल्कि बदलते समय का गंभीर संकेत है। अप्रैल, जो कभी मौसम के सुखद संक्रमण (Transition – एक अवस्था से दूसरी अवस्था में परिवर्तन) का महीना माना जाता था, इस वर्ष एक कठोर चेतावनी बनकर सामने आया—और अब मई की शुरुआत ही उस चेतावनी को और गहरा कर रही है। थर्मामीटर का बढ़ता पारा केवल आंकड़े नहीं बता रहा, बल्कि एक असहज सवाल भी खड़ा कर रहा है—क्या हम अपने ही बनाए कंक्रीट के संसार में फंसकर प्रकृति के संतुलन को खो चुके हैं? और यदि ऐसा है, तो यह स्थिति केवल एक मौसमी असुविधा नहीं, बल्कि हमारे अस्तित्व की दिशा तय करने वाला निर्णायक मोड़ है। इस बार चिंता का विषय केवल तात्कालिक तापमान नहीं, बल्कि वह असामान्य ‘शुरुआत’ है, जिसने दशकों पुराने रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए। जहाँ कभी ऋतुओं का बदलाव धीरे-धीरे...