"स्मार्ट घरों के 'डिजिटल पहरेदार': रक्षक या भक्षक?"
‘तकनीक का 'शॉर्ट-सर्किट’: सुविधा की चमक में झुलसती सुरक्षा (प्रवीण कक्कड़) आधुनिकता की अंधी दौड़ में हम अपने घरों को 'स्मार्ट' बनाने की चाहत में सुरक्षा के उस बुनियादी सिद्धांत को भूलते जा रहे हैं, जो जीवन और मृत्यु के बीच की लकीर होता है। जिस तकनीक को हमने अपनी दहलीज की रखवाली के लिए चुना था, क्या वही आज हमारी सांसों की दुश्मन बन बैठी है? हाल ही में इंदौर में हुई वह हृदयविदारक घटना, जिसमें एक परिवार अपने ही घर के 'स्मार्ट सेंसर लॉक' की वजह से काल के गाल में समा गया, हमारे समाज के लिए एक गंभीर चेतावनी है। आग की लपटें बाहर थीं और तकनीक की बेड़ियाँ अंदर। इससे पहले एक कारोबारी के आलीशान पेंटहाउस में भी यही मंजर दिखा था जहाँ दरवाज़ा तकनीक के भरोसे बंद था, लेकिन संकट के समय वही तकनीक उसकी मौत का कारण बन गई। यह केवल दो घटनाएं नहीं हैं, बल्कि उस खतरनाक ट्रेंड का संकेत हैं जहाँ हम सुरक्षा के नाम पर 'सुविधा' को घर ला रहे हैं, विवेक को नहीं। सेंसर आधारित लॉक चाहे वे फिंगरप्रिंट, फेस रिकग्निशन या पासवर्ड पर आधारित हों पूरी तरह बिजली, बैटरी और सॉफ्टवेयर पर निर्भर होते ह...