महाशिवरात्रि: आदि-प्रेम का शाश्वत उत्सव
प्रेम का भारतीय दर्शन और आत्मबोध का पर्व ( प्रवीण कक्कड़ ) कल दुनिया ने वेलेंटाइन डे मनाया , गुलाब , उपहार और वादों का एक दिन। लेकिन आज जब हम महाशिवरात्रि के महापर्व में प्रवेश करते हैं , तो एक गहरी अनुभूति होती है कि प्रेम केवल प्रदर्शन नहीं , बल्कि सृष्टि का आधार है। जहाँ एक ओर आधुनिक उत्सव प्रेम को एक भावनात्मक घटना की तरह प्रस्तुत करते हैं , वहीं महाशिवरात्रि हमें उस ‘आदि-प्रेम’ की याद दिलाती है , जिसने शून्य से सृष्टि का विस्तार किया। भारतीय चिंतन में प्रेम किसी क्षणिक आकर्षण का नाम नहीं , बल्कि शिव और शक्ति के शाश्वत एकत्व का प्रतीक है। यह केवल दांपत्य का उत्सव नहीं , बल्कि चेतना और प्रकृति के दिव्य मिलन का पर्व है। जब वैराग्य ने गृहस्थ को स्वीकारा महाशिवरात्रि को शिव-पार्वती विवाह का प्रतीक माना जाता है। किंतु यह विवाह केवल एक पौराणिक कथा नहीं ; यह जीवन का गहन दार्शनिक संकेत है। हिमालय की पुत्री पार्वती का कठोर तप यह सिद्ध करता है कि प्रेम पाने से पहले स्वयं को साधना पड़ता है। प्रेम अधिकार नहीं , अर्जन है ; आग्रह नहीं , आत्मरूपांतरण है। शिव पूर्ण वैरागी हैं - अचल , न...