दीपावली पर घर ही नहीं, जीवन भी रोशन हो
दूरियाँ मिटाएँ, संवाद बढ़ाएँ और खुशियों मनाएँ (प्रवीण कक्कड़) दीपों की रोशनी से दिशाएँ जगमगाती हैं, प्रेम और विश्वास से ज़िंदगियाँ मुस्कुराती हैं दीपावली पर हम घरों की सफाई करते हैं, लेकिन क्या कभी मन में जमा अहंकार, रिश्तों में आई दूरियाँ और व्यवहार में बढ़ती कड़वाहट को साफ करने का विचार करते हैं? आज घर बड़े हो रहे हैं, लेकिन परिवार छोटे; संपर्क बढ़ रहे हैं, लेकिन संवाद घट रहे हैं। सोशल मीडिया पर हजारों शुभकामनाएँ भेजने वाले हम, कभी अपने ही घर में बैठे व्यक्ति का हाल पूछना भूल जाते हैं। आर्थिक समृद्धि की दौड़ में भावनात्मक संपन्नता कहीं पीछे छूट रही है। ऐसे समय में दीपावली केवल उत्सव नहीं, आत्ममंथन का अवसर है। क्यों न इस बार घर के साथ अपने विचार, व्यवहार और संबंधों को भी रोशन करें? परंपरा में छिपा जीवन का दर्शन दीपावली भगवान श्रीराम के अयोध्या लौटने की स्मृति से जुड़ी है। जैन परंपरा में भगवान महावीर का निर्वाण और सिख परंपरा में बंदी छोड़ दिवस भी इसी उत्सव से जुड़े हैं। इन परंपराओं का साझा संदेश है अंधकार पर प्रकाश और बंधन पर मुक्ति। धनतेरस स्वास्थ्य एवं समृद्धि, नरक चतुर्दशी बुरा...