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भगोरिया: मिट्टी की महक से सजा सांस्कृतिक कुंभ

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  जहाँ 'पान' और 'गुलाल' से रची जाती है प्रेम की इबारत ​ (प्रवीण कक्कड़) ​"संस्कृति वो जड़ है जो हमें तूफानों में भी खड़ा रखती है,  और उत्सव वो टहनी है जिस पर खुशियों के फूल खिलते हैं।" ​फाल्गुन की हवाओं में जब पलाश के सुर्ख फूलों की मादक गंध घुलने लगती है और खेतों में गेहूँ की बालियाँ सुनहरी होकर झूमने लगती हैं, तब आदिवासी क्षेत्रों की पहाड़ियों में एक अलग ही संगीत गूँजने लगता है। यह संगीत है—भगोरिया का। भगोरिया केवल एक लोक-उत्सव नहीं है; यह मालवा और निमाड़ के आदिवासी समाज के स्वाभिमान, उनकी सादगी और प्रकृति के प्रति उनके अगाध प्रेम का जीवंत घोषणापत्र है। यह उत्सव बताता है कि दुनिया चाहे कितनी भी आधुनिक क्यों न हो जाए, अपनी जड़ों की ओर लौटने का आनंद ही कुछ और है। ​ परंपरा और आधुनिकता का द्वंद्व ​आज के दौर में जब हम भगोरिया को देखते हैं, तो एक तरफ पारंपरिक मांदल की थाप है और दूसरी तरफ आधुनिकता का शोर। करीब चार दशक पहले मेरी पुलिस विभाग की पहली पोस्टिंग यहीं हुई थी, तब से अब तक परिदृश्य बहुत बदला है। जहाँ कभी प्रकृति की प्रधानता होती थी, वहाँ अब बाजारवाद का रंग ...

महाशिवरात्रि: आदि-प्रेम का शाश्वत उत्सव

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प्रेम का भारतीय दर्शन और आत्मबोध का पर्व ( प्रवीण कक्कड़ ) कल दुनिया ने वेलेंटाइन डे मनाया , गुलाब , उपहार और वादों का एक दिन। लेकिन आज जब हम महाशिवरात्रि के महापर्व में प्रवेश करते हैं , तो एक गहरी अनुभूति होती है कि प्रेम केवल प्रदर्शन नहीं , बल्कि सृष्टि का आधार है। जहाँ एक ओर आधुनिक उत्सव प्रेम को एक भावनात्मक घटना की तरह प्रस्तुत करते हैं , वहीं महाशिवरात्रि हमें उस ‘आदि-प्रेम’ की याद दिलाती है , जिसने शून्य से सृष्टि का विस्तार किया। भारतीय चिंतन में प्रेम किसी क्षणिक आकर्षण का नाम नहीं , बल्कि शिव और शक्ति के शाश्वत एकत्व का प्रतीक है। यह केवल दांपत्य का उत्सव नहीं , बल्कि चेतना और प्रकृति के दिव्य मिलन का पर्व है। जब वैराग्य ने गृहस्थ को स्वीकारा महाशिवरात्रि को शिव-पार्वती विवाह का प्रतीक माना जाता है। किंतु यह विवाह केवल एक पौराणिक कथा नहीं ; यह जीवन का गहन दार्शनिक संकेत है। हिमालय की पुत्री पार्वती का कठोर तप यह सिद्ध करता है कि प्रेम पाने से पहले स्वयं को साधना पड़ता है। प्रेम अधिकार नहीं , अर्जन है ; आग्रह नहीं , आत्मरूपांतरण है। शिव पूर्ण वैरागी हैं - अचल , न...

प्रेम: सिर्फ उत्सव नहीं, एक नैतिक जिम्मेदारी भी

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वेलेंटाइन वीक के बीच वास्तविकता से संवाद ( प्रवीण कक्कड़ ) आज का दौर तकनीक, गति और सूचनाओं का दौर है, लेकिन इस चमक-धमक के पीछे एक कड़वा सच यह भी है कि यह ‘बाज़ारवाद’ द्वारा संचालित सोच का युग है। बाज़ार आज केवल उत्पाद नहीं बेच रहा, वह हमारी संवेदनाएँ, हमारी पसंद और यहाँ तक कि हमारे प्रेम करने के तरीकों को भी नियंत्रित करने लगा है। इन दिनों वेलेंटाइन वीक की बयार है रोज़ डे के गुलाबों से लेकर चॉकलेट डे और टेडी डे के उपहारों तक, हर दिन के साथ एक नया उत्पाद और एक नया मनोवैज्ञानिक दबाव युवा मस्तिष्क पर बनाया जा रहा है। सच्चाई यह है कि इस उत्सव की चकाचौंध के समानांतर एक डरावनी हकीकत भी है। प्रेम के नाम पर बिछाए जा रहे छलावे के कारण रोज़ाना युवाओं के भावनात्मक शोषण और ब्लैकमेलिंग की घटनाएँ सामने आ रही हैं। जो प्रेम जीवन का संबल होना चाहिए था, वही आज युवाओं को नशे और अपराध के दलदल में धकेल रहा है। यही कारण है कि आज का युवा जागरूक होने की बजाय अक्सर आकर्षण और तात्कालिक सुख के कुहासे में भटकता नज़र आता है। वर्तमान में हम ‘वेलेंटाइन वीक’ के मध्य में हैं, जहाँ हर दिन के साथ एक नया उत्पाद और एक नया...