परीक्षा: अंक नहीं, आत्मविश्वास गढ़ने का समय
परीक्षाओं से आगे भी एक दुनिया है और वही असली शिक्षा है (प्रवीण कक्कड़) फरवरी की आहट के साथ ही देश के लाखों घरों में एक विशेष हलचल शुरू हो जाती है। यह वह समय है जब किताबों की गंध, कापियों के बिखरे पन्ने और घड़ियों की टिक-टिक पहले से कहीं अधिक तेज सुनाई देने लगती है। अक्सर हम कहते हैं कि परीक्षाओं का सीजन आ गया है, लेकिन गहराई से देखें तो जब फरवरी आता है, तो केवल परीक्षा नहीं आती—निर्णय भी आते हैं। यह निर्णय केवल इस बात के नहीं होते कि बच्चा अगली कक्षा में जाएगा या नहीं, बल्कि ये निर्णय होते हैं बच्चे के धैर्य, उसकी अनुशासन शक्ति और दबाव में काम करने की क्षमता के। यह समय केवल विद्यार्थियों के लिए नहीं, बल्कि माता-पिता और शिक्षकों के लिए भी धैर्य की एक कठिन परीक्षा का होता है। हमें सामूहिक रूप से यह समझने की आवश्यकता है कि ये वार्षिक या बोर्ड परीक्षाएँ जीवन का अंतिम पड़ाव नहीं हैं। ये तो महज एक माध्यम हैं व्यक्तित्व को निखारने का, अनुशासन सीखने का और अपनी सीमाओं को पहचानने का। अंक बनाम योग्यता: एक बड़ा भ्रम आज के दौर का सबसे बड़ा भ्रम यह है कि अंक ही योग्यता का एकमात्र पैमाना हैं। सम...