“जियो, हंसो और प्रेम करो; यही सबसे बड़ा ध्यान है।”
ओशो: चेतना, स्वतंत्रता और मुक्ति का महासंगीत 19 जनवरी: 'ओशो दिवस' पर विशेष (प्रवीण कक्कड़) 36 वर्ष पहले, 19 जनवरी 1990 को पुणे में एक असाधारण चेतना ने अपनी देह का त्याग किया। आचार्य रजनीश, जिन्हें दुनिया ‘ओशो’ के नाम से जानती है, वे केवल एक आध्यात्मिक गुरु नहीं थे; एक ऐसी विचार-क्रांति थे जिन्होंने मनुष्य को ‘स्वयं होने’ का साहस दिया। इस विशेष दिन को पूरा विश्व और ओशो के अनुयायी 'ओशो दिवस' के रूप में मनाते हैं। ओशो ने धर्म, ध्यान और जीवन के अर्थ को एक नई और जीवंत दृष्टि दी, एक ऐसी दृष्टि, जिसकी प्रासंगिकता आज की जटिल और बेचैन दुनिया में और भी गहरी हो गई है। उनके प्रवचनों के हजारों संकलन उपलब्ध हैं, पर उनका मूल सार यही है कि “जियो, हंसो और प्रेम करो; यही सबसे बड़ा ध्यान है।” ओशो के अनुसार धार्मिकता किसी संस्था से नहीं, बल्कि जागरूकता से जन्म लेती है। उन्होंने ध्यान को मंदिर-मस्जिद की सीमाओं से निकालकर रोज़मर्रा की जिंदगी तक पहुँचाया। उनके अनुसार ध्यान केवल आँख बंद करके बैठना नहीं है, बल्कि हर कार्य चलना, खाना, काम, प्रेम को होशपूर्वक करना है। आज का युवा: शोर में शांति की...