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परीक्षा: अंक नहीं, आत्मविश्वास गढ़ने का समय

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परीक्षाओं से आगे भी एक दुनिया है और वही असली शिक्षा है  (प्रवीण कक्कड़) फरवरी की आहट के साथ ही देश के लाखों घरों में एक विशेष हलचल शुरू हो जाती है। यह वह समय है जब किताबों की गंध, कापियों के बिखरे पन्ने और घड़ियों की टिक-टिक पहले से कहीं अधिक तेज सुनाई देने लगती है। अक्सर हम कहते हैं कि परीक्षाओं का सीजन आ गया है, लेकिन गहराई से देखें तो जब फरवरी आता है, तो केवल परीक्षा नहीं आती—निर्णय भी आते हैं। यह निर्णय केवल इस बात के नहीं होते कि बच्चा अगली कक्षा में जाएगा या नहीं, बल्कि ये निर्णय होते हैं बच्चे के धैर्य, उसकी अनुशासन शक्ति और दबाव में काम करने की क्षमता के। यह समय केवल विद्यार्थियों के लिए नहीं, बल्कि माता-पिता और शिक्षकों के लिए भी धैर्य की एक कठिन परीक्षा का होता है। हमें सामूहिक रूप से यह समझने की आवश्यकता है कि ये वार्षिक या बोर्ड परीक्षाएँ जीवन का अंतिम पड़ाव नहीं हैं। ये तो महज एक माध्यम हैं व्यक्तित्व को निखारने का, अनुशासन सीखने का और अपनी सीमाओं को पहचानने का। अंक बनाम योग्यता: एक बड़ा भ्रम आज के दौर का सबसे बड़ा भ्रम यह है कि अंक ही योग्यता का एकमात्र पैमाना हैं। सम...

गणतंत्र का गौरव: अधिकारों के आकाश में कर्तव्यों की उड़ान

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कर्तव्य पथ पर युवा भारत: संकल्प से सिद्धि का नया अध्याय (प्रवीण कक्कड़) 26 जनवरी केवल राष्ट्रीय पर्व नहीं है। यह आत्म-मंथन का अवसर है, यह सोचने का कि एक नागरिक के रूप में हम अपने अधिकारों के प्रति जितने सजग हैं, क्या अपने कर्तव्यों के प्रति भी उतने ही उत्तरदायी हैं। इसी दिन भारत ने स्वयं को एक गणतांत्रिक राष्ट्र के रूप में स्थापित किया था। हमारे संविधान ने हमें केवल गणतंत्र नहीं दिया, बल्कि एक सशक्त, समावेशी और उत्तरदायी राष्ट्र के निर्माण की साझा जिम्मेदारी भी सौंपी। आज जब भारत एक आधुनिक, आत्मनिर्भर और विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, तब यह जिम्मेदारी सबसे अधिक युवाओं के कंधों पर आ टिकती है। देश का वर्तमान भले ही अनुभव और परंपरा से संचालित हो, लेकिन उसका भविष्य युवाओं की सोच, उनके आचरण और उनके मूल्यों से ही आकार लेगा। गणतंत्र की मजबूती का असली पैमाना यही है कि उसका युवा वर्ग अधिकारों के साथ-साथ कर्तव्यों को कितनी गंभीरता से स्वीकार करता है।  कर्तव्य की पाठशाला: समाज की सामूहिक जिम्मेदारी कर्तव्यों की समझ केवल पाठ्यपुस्तकों से नहीं आती। इसके लिए परिवार, समाज और संस्थ...

“जियो, हंसो और प्रेम करो; यही सबसे बड़ा ध्यान है।”

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ओशो: चेतना, स्वतंत्रता और मुक्ति का महासंगीत 19 जनवरी: 'ओशो दिवस' पर विशेष (प्रवीण कक्कड़) 36 वर्ष पहले, 19 जनवरी 1990 को पुणे में एक असाधारण चेतना ने अपनी देह का त्याग किया। आचार्य रजनीश, जिन्हें दुनिया ‘ओशो’ के नाम से जानती है, वे केवल एक आध्यात्मिक गुरु नहीं थे; एक ऐसी विचार-क्रांति थे जिन्होंने मनुष्य को ‘स्वयं होने’ का साहस दिया। इस विशेष दिन को पूरा विश्व और ओशो के अनुयायी 'ओशो दिवस' के रूप में मनाते हैं। ओशो ने धर्म, ध्यान और जीवन के अर्थ को एक नई और जीवंत दृष्टि दी, एक ऐसी दृष्टि, जिसकी प्रासंगिकता आज की जटिल और बेचैन दुनिया में और भी गहरी हो गई है। उनके प्रवचनों के हजारों संकलन उपलब्ध हैं, पर उनका मूल सार यही है कि “जियो, हंसो और प्रेम करो; यही सबसे बड़ा ध्यान है।” ओशो के अनुसार धार्मिकता किसी संस्था से नहीं, बल्कि जागरूकता से जन्म लेती है। उन्होंने ध्यान को मंदिर-मस्जिद की सीमाओं से निकालकर रोज़मर्रा की जिंदगी तक पहुँचाया। उनके अनुसार ध्यान केवल आँख बंद करके बैठना नहीं है, बल्कि हर कार्य चलना, खाना, काम, प्रेम को होशपूर्वक करना है। आज का युवा: शोर में शांति की...

उड़ान, उजास और उत्तरायण: आपकी जिंदगी का नया अध्याय

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मकर संक्रांति पर विज्ञान और संस्कृति का महासंगम  (प्रवीण कक्कड़) हमारी संस्कृति केवल परंपराओं का संग्रह नहीं, बल्कि गहन विज्ञान का उत्सव है। जब सूर्य धनु से मकर राशि में प्रवेश करता है, तब वह केवल दिशा नहीं बदलता, बल्कि पृथ्वी पर ऊर्जा, ताप और जीवन-चक्र के एक नए अध्याय का अभिषेक करता है। हमारे पूर्वजों ने इसे ‘उत्तरायण’ कहा जो खगोलीय रूप से अंधकार के संकुचन और 'उजास' के विस्तार का उद्घोष है। यह पर्व प्रमाण है कि भारत ने युगों पहले ही समझ लिया था कि ब्रह्मांड की गतियां किस प्रकार हमारी चेतना को एक नई 'उड़ान' और जीवन के प्रवाह को नया आकार देती हैं। जिस प्रकार सूर्य अपनी निरंतर यात्रा से भीषण शीत को भी पराजित कर देता है, ठीक वैसे ही आपके जीवन की कठिन परिस्थितियाँ भी आपके अटूट संकल्प के सामने पिघल सकती हैं। सूर्य कभी विश्राम नहीं करता; वह हमें सिखाता है कि लक्ष्य चाहे क्षितिज जितना दूर हो, निरंतरता ही सफलता का एकमात्र अचूक सूत्र है। संगठन की शक्ति और वाणी की मिठास मकर संक्रांति के तिल-गुड़ केवल मिष्ठान नहीं, बल्कि सफल जीवन के मैनेजमेंट सूत्र हैं। तिल का सूक्ष्म दाना जब गुड़...

भटकाव की डगर पर 'भविष्य' का भारत

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हम युवाओं को सिर्फ सपने देंगे या सही रास्ता भी? स्वामी विवेकानंद की जयंती: उत्सव और आत्ममंथन के बीच देश  (प्रवीण कक्कड़) पूरा देश 12 जनवरी को स्वामी विवेकानंद की जयंती को युवा दिवस के रूप में मनाता है। आज स्वामीजी के बारे में सोचते हुए वर्तमान पीढ़ी को लेकर कई प्रश्न मन में उठते हैं। 1893 के शिकागो विश्व धर्म सम्मेलन में जिस तरुण संन्यासी ने भारत की आध्यात्मिक गरिमा को विश्व के हृदय तक पहुँचाया था, उनकी स्मृति आज भी हमारी राष्ट्रीय चेतना को गौरवान्वित करती है। लेकिन उत्सव की इस रोशनी के बीच एक धुंधला, पर बेहद जरूरी प्रश्न हमारे सामने खड़ा है क्या हम स्वामीजी के विचारों को जी रहे हैं, या केवल उनकी स्मृति का अनुष्ठान कर रहे हैं? आज का युवा - जिसे विवेकानंद “राष्ट्र का निर्माता” कहते थे क्या सच में निर्माण की दिशा में आगे बढ़ रहा है, या आधुनिकता की चकाचौंध में अपनी ऊर्जा का विसर्जन कर रहा है? यह समय केवल जयघोष का नहीं, बल्कि गहरे आत्ममंथन का है कि हम अपनी भावी पीढ़ी को केवल ऊँचे सपने थमा रहे हैं या उन्हें उन सपनों तक पहुँचने का सही मार्ग भी दिखा पा रहे हैं। क्षमता का नहीं, बल्कि दिशा ...

जवाबदेही का अकाल: पाइपलाइनों में दौड़ता ज़हर

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स्वच्छता का ‘नंबर 1’ तमगा और भागीरथपुरा की सिसकियाँ “सवाल व्यवस्था से भी और खुद से भी: क्या हम केवल हादसों के बाद जागने वाले समाज बन गए हैं?” सिर्फ अवॉर्ड काफी नहीं, नागरिकों को सुरक्षित जीवन का अधिकार चाहिए (प्रवीण कक्कड़) देश के सबसे स्वच्छ शहर का तमगा इंदौर को गर्व देता है। यह गौरव वर्षों की मेहनत, जनभागीदारी और प्रशासनिक प्रयासों का परिणाम है। लेकिन जब इसी शहर के भागीरथपुरा क्षेत्र में दूषित पानी के कारण लोगों की असमय मृत्यु होती है और सैकड़ों नागरिक अस्पतालों में जीवन के लिए संघर्ष करते हैं, तो यह तमगा आत्ममंथन की मांग करने लगता है। यह केवल एक मोहल्ले की त्रासदी नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक जवाबदेही पर लगा एक गंभीर प्रश्नचिह्न है। खतरे की घंटी: पुरानी पाइपलाइनें और चूक स्थानीय रिपोर्टों और चिकित्सकीय तथ्यों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यह संकट आकस्मिक नहीं था। हैजा (Cholera) और गैस्ट्रोएन्टराइटिस (Gastroenteritis) जैसे जल-जनित रोगों का फैलना इस बात की पुष्टि है कि पेयजल आपूर्ति प्रणाली में गंभीर चूक हुई है। इंदौर का जल-आपूर्ति नेटवर्क कई दशकों पुराना है, जहाँ अनेक स्थानों पर सीवेज और प...

"2026 की दहलीज: यादों का बोझ उतारिए, संकल्पों को पंख दीजिए

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नया साल तारीख नहीं, सोच बदलने का अवसर है (प्रवीण कक्कड़) हर नया साल एक सवाल लेकर आता है—क्या बदलेगा? लेकिन असल सवाल यह होना चाहिए कि हम क्या बदलेंगे। कैलेंडर बदलने से हालात नहीं बदलते, हालात बदलते हैं सोच, आदत और दृष्टि से। बीता हुआ साल अगर सिर्फ अफसोस, शिकायत और पछतावे के साथ विदा किया गया, तो नया साल भी वही कहानी दोहराएगा। 2026 की दहलीज पर खड़े होकर यह समझना ज़रूरी है कि बीते साल की असफलताएँ बोझ नहीं हैं, वे अनुभव हैं और अनुभव वही पूंजी है जिससे भविष्य की इमारत खड़ी होती है। नया साल उम्मीद का पोस्टर नहीं, आत्मसंयम और आत्मविश्वास की कार्ययोजना है। गलतियों को सबक में बदलने का समय 2025 ने हममें से कई लोगों को निराश किया होगा, किसी के सपने अधूरे रह गए, किसी को अपनों से ठेस मिली, तो किसी को अपने ही फैसलों पर पछतावा हुआ। लेकिन बीते साल को अगर हम केवल नुकसान की सूची मानकर याद रखें, तो हम खुद के साथ अन्याय कर रहे हैं। गलतियाँ जीवन का अंत नहीं होतीं, वे दिशा संकेत होती हैं। जो खो गया, उसे बार-बार याद करना मानसिक बोझ बढ़ाता है, लेकिन उस अनुभव से मिली सीख जीवन भर साथ रहती है। पुरानी कड़वाहटों को...