कई राजू को जेंटलमैन बनने का इंतजार...
क्या शिक्षा से वंचित बचपन को हम स्कूल तक ले जाने को तैयार हैं ? ( प्रवीण कक्कड़ ) गर्मियों की छुट्टियां खत्म हो रही हैं। बाजारों में नए बस्ते , किताबों की खुशबू और रंग-बिरंगी यूनिफॉर्म नजर आने लगी हैं। स्कूलों में ' प्रवेश उत्सव ' की तैयारियां हैं , ताकि नौनिहालों का स्वागत किया जा सके लेकिन इस चमक-दमक के बीच , क्या हम एक समाज के रूप में खुद से एक बेहद ईमानदार सवाल पूछने के लिए तैयार हैं ? क्या ' शिक्षा का अधिकार ' वाकई देश के हर आखिरी बच्चे तक पहुंच पाया है , या यह सिर्फ फाइलों और उत्सवों तक सीमित है ? आज से करीब साढ़े तीन दशक पहले , 1992 में शाहरुख खान की चर्चित फिल्म ' राजू बन गया जेंटलमैन ' आई थी। फिल्म का राजू तो जेंटलमैन बन गया , लेकिन 2026 के भारत में आज भी चाय के ठेलों , ढाबों , ट्रैफिक सिग्नलों और मॉलों के बाहर न जाने कितने ' राजू ' ऐसे हैं , जिन्हें जेंटलमैन बनने का अवसर ही नहीं मिला। कितनी ही ' मुनिया ' और ' गुड़िया ' हैं , जो स्कूल की घंटी सुनने के बजाय घरों में काम करने या छोटे भाई-बहनों की जिम्मेदारी उठाने को मजब...