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उड़ान, उजास और उत्तरायण: आपकी जिंदगी का नया अध्याय

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मकर संक्रांति पर विज्ञान और संस्कृति का महासंगम  (प्रवीण कक्कड़) हमारी संस्कृति केवल परंपराओं का संग्रह नहीं, बल्कि गहन विज्ञान का उत्सव है। जब सूर्य धनु से मकर राशि में प्रवेश करता है, तब वह केवल दिशा नहीं बदलता, बल्कि पृथ्वी पर ऊर्जा, ताप और जीवन-चक्र के एक नए अध्याय का अभिषेक करता है। हमारे पूर्वजों ने इसे ‘उत्तरायण’ कहा जो खगोलीय रूप से अंधकार के संकुचन और 'उजास' के विस्तार का उद्घोष है। यह पर्व प्रमाण है कि भारत ने युगों पहले ही समझ लिया था कि ब्रह्मांड की गतियां किस प्रकार हमारी चेतना को एक नई 'उड़ान' और जीवन के प्रवाह को नया आकार देती हैं। जिस प्रकार सूर्य अपनी निरंतर यात्रा से भीषण शीत को भी पराजित कर देता है, ठीक वैसे ही आपके जीवन की कठिन परिस्थितियाँ भी आपके अटूट संकल्प के सामने पिघल सकती हैं। सूर्य कभी विश्राम नहीं करता; वह हमें सिखाता है कि लक्ष्य चाहे क्षितिज जितना दूर हो, निरंतरता ही सफलता का एकमात्र अचूक सूत्र है। संगठन की शक्ति और वाणी की मिठास मकर संक्रांति के तिल-गुड़ केवल मिष्ठान नहीं, बल्कि सफल जीवन के मैनेजमेंट सूत्र हैं। तिल का सूक्ष्म दाना जब गुड़...

भटकाव की डगर पर 'भविष्य' का भारत

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हम युवाओं को सिर्फ सपने देंगे या सही रास्ता भी? स्वामी विवेकानंद की जयंती: उत्सव और आत्ममंथन के बीच देश  (प्रवीण कक्कड़) पूरा देश 12 जनवरी को स्वामी विवेकानंद की जयंती को युवा दिवस के रूप में मनाता है। आज स्वामीजी के बारे में सोचते हुए वर्तमान पीढ़ी को लेकर कई प्रश्न मन में उठते हैं। 1893 के शिकागो विश्व धर्म सम्मेलन में जिस तरुण संन्यासी ने भारत की आध्यात्मिक गरिमा को विश्व के हृदय तक पहुँचाया था, उनकी स्मृति आज भी हमारी राष्ट्रीय चेतना को गौरवान्वित करती है। लेकिन उत्सव की इस रोशनी के बीच एक धुंधला, पर बेहद जरूरी प्रश्न हमारे सामने खड़ा है क्या हम स्वामीजी के विचारों को जी रहे हैं, या केवल उनकी स्मृति का अनुष्ठान कर रहे हैं? आज का युवा - जिसे विवेकानंद “राष्ट्र का निर्माता” कहते थे क्या सच में निर्माण की दिशा में आगे बढ़ रहा है, या आधुनिकता की चकाचौंध में अपनी ऊर्जा का विसर्जन कर रहा है? यह समय केवल जयघोष का नहीं, बल्कि गहरे आत्ममंथन का है कि हम अपनी भावी पीढ़ी को केवल ऊँचे सपने थमा रहे हैं या उन्हें उन सपनों तक पहुँचने का सही मार्ग भी दिखा पा रहे हैं। क्षमता का नहीं, बल्कि दिशा ...

जवाबदेही का अकाल: पाइपलाइनों में दौड़ता ज़हर

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स्वच्छता का ‘नंबर 1’ तमगा और भागीरथपुरा की सिसकियाँ “सवाल व्यवस्था से भी और खुद से भी: क्या हम केवल हादसों के बाद जागने वाले समाज बन गए हैं?” सिर्फ अवॉर्ड काफी नहीं, नागरिकों को सुरक्षित जीवन का अधिकार चाहिए (प्रवीण कक्कड़) देश के सबसे स्वच्छ शहर का तमगा इंदौर को गर्व देता है। यह गौरव वर्षों की मेहनत, जनभागीदारी और प्रशासनिक प्रयासों का परिणाम है। लेकिन जब इसी शहर के भागीरथपुरा क्षेत्र में दूषित पानी के कारण लोगों की असमय मृत्यु होती है और सैकड़ों नागरिक अस्पतालों में जीवन के लिए संघर्ष करते हैं, तो यह तमगा आत्ममंथन की मांग करने लगता है। यह केवल एक मोहल्ले की त्रासदी नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक जवाबदेही पर लगा एक गंभीर प्रश्नचिह्न है। खतरे की घंटी: पुरानी पाइपलाइनें और चूक स्थानीय रिपोर्टों और चिकित्सकीय तथ्यों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यह संकट आकस्मिक नहीं था। हैजा (Cholera) और गैस्ट्रोएन्टराइटिस (Gastroenteritis) जैसे जल-जनित रोगों का फैलना इस बात की पुष्टि है कि पेयजल आपूर्ति प्रणाली में गंभीर चूक हुई है। इंदौर का जल-आपूर्ति नेटवर्क कई दशकों पुराना है, जहाँ अनेक स्थानों पर सीवेज और प...

"2026 की दहलीज: यादों का बोझ उतारिए, संकल्पों को पंख दीजिए

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नया साल तारीख नहीं, सोच बदलने का अवसर है (प्रवीण कक्कड़) हर नया साल एक सवाल लेकर आता है—क्या बदलेगा? लेकिन असल सवाल यह होना चाहिए कि हम क्या बदलेंगे। कैलेंडर बदलने से हालात नहीं बदलते, हालात बदलते हैं सोच, आदत और दृष्टि से। बीता हुआ साल अगर सिर्फ अफसोस, शिकायत और पछतावे के साथ विदा किया गया, तो नया साल भी वही कहानी दोहराएगा। 2026 की दहलीज पर खड़े होकर यह समझना ज़रूरी है कि बीते साल की असफलताएँ बोझ नहीं हैं, वे अनुभव हैं और अनुभव वही पूंजी है जिससे भविष्य की इमारत खड़ी होती है। नया साल उम्मीद का पोस्टर नहीं, आत्मसंयम और आत्मविश्वास की कार्ययोजना है। गलतियों को सबक में बदलने का समय 2025 ने हममें से कई लोगों को निराश किया होगा, किसी के सपने अधूरे रह गए, किसी को अपनों से ठेस मिली, तो किसी को अपने ही फैसलों पर पछतावा हुआ। लेकिन बीते साल को अगर हम केवल नुकसान की सूची मानकर याद रखें, तो हम खुद के साथ अन्याय कर रहे हैं। गलतियाँ जीवन का अंत नहीं होतीं, वे दिशा संकेत होती हैं। जो खो गया, उसे बार-बार याद करना मानसिक बोझ बढ़ाता है, लेकिन उस अनुभव से मिली सीख जीवन भर साथ रहती है। पुरानी कड़वाहटों को...

अंधेरे की अंतिम सीमा: यहीं से उजाले की शुरुआत

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- 21 दिसंबर को रात सबसे लंबी और दिन सबसे छोटा - भौगोलिक घटना से सीख लेकर जीवन में जोड़िए उम्मीद (प्रवीण कक्कड़) इक्कीस दिसंबर प्रकृति के कैलेंडर में केवल एक तारीख नहीं, बल्कि एक गहरा संकेत है। यह वही दिन है जब हम वर्ष की सबसे लंबी रात और सबसे छोटे दिन का अनुभव करते हैं। भौगोलिक विज्ञान इसे शीत अयनांत (Winter Solstice) कहता है, लेकिन जीवन की दृष्टि से देखें तो यह एक अत्यंत अर्थपूर्ण घटना है। यह हमें बताती है कि जब अंधकार अपनी चरम सीमा पर पहुँच जाता है, ठीक उसी क्षण से प्रकाश की वापसी शुरू हो जाती है। भौगोलिक दृष्टि से देखें तो 21 दिसंबर को रात सबसे लंबी और दिन सबसे छोटा होता है। भारत के अधिकांश हिस्सों में इस दिन रात लगभग 13 से 14 घंटे तक होती है, जबकि दिन की अवधि करीब 10 से 11 घंटे रहती है। अक्षांश बदलने के साथ यह अंतर घटता–बढ़ता रहता है, लेकिन शीत अयनांत की अवधि लगभग इसी अनुपात में रहती है। 21 दिसंबर के बाद दिन धीरे-धीरे बड़े होने लगते हैं और रातें छोटी। यानी अंधेरा घटता है और उजाला अपना स्थान वापस पाने लगता है। प्रकृति का यही अटल नियम है—कोई भी स्थिति, चाहे वह कितनी भी विकट क्यों न ह...

ऊर्जा संरक्षण: आज का अनुशासन, कल की राष्ट्रीय सुरक्षा

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एक यूनिट बिजली बचाना, सवा यूनिट उत्पादन के बराबर है 14 दिसंबर राष्ट्रीय ऊर्जा संरक्षण दिवस के विशेष संदर्भ में ( प्रवीण कक्कड़ ) ऊर्जा संरक्षण आज केवल पर्यावरण या घरेलू बिजली बिल का विषय नहीं रह गया है। यह अब राष्ट्र की आर्थिक स्थिरता, रणनीतिक सुरक्षा और आत्मनिर्भरता से जुड़ा हुआ प्रश्न बन चुका है। 14 दिसंबर को मनाया जाने वाला राष्ट्रीय ऊर्जा संरक्षण दिवस हमें यह समझने का अवसर देता है कि ऊर्जा की बचत भी ऊर्जा उत्पादन का ही एक प्रभावी और जिम्मेदार स्वरूप है। बदलते वैश्विक परिदृश्य में ऊर्जा संरक्षण भारत के लिए एक विकल्प नहीं, बल्कि अनिवार्य राष्ट्रीय नीति बन चुका है। ऊर्जा संरक्षण हम सब की जिम्मेदारी है याद रखिये - एक यूनिट बिजली बचाना, सवा यूनिट उत्पादन के बराबर है। ऊर्जा संरक्षण का मूल मंत्र सरल शब्दों में कहा जाए तो “कम संसाधनों में अधिक उत्पादन और कम प्रदूषण में अधिक विकास” यही ऊर्जा संरक्षण का मूल दर्शन है। यह दर्शन हमें बताता है कि विकास और पर्यावरण परस्पर विरोधी नहीं हैं, बल्कि संतुलन के साथ आगे बढ़ने पर एक-दूसरे को सशक्त करते हैं। एक दूरदर्शी शुरुआत भारत में ऊर्जा संरक्षण की संग...

सीमा पर साहस और समाज में संवेदना

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शौर्य के उत्सव और जिम्मेदारी को याद दिलाने वाला दिन सशस्त्र सेना झंडा दिवस आज (प्रवीण कक्कड़) हर वर्ष 7 दिसंबर को भारत ‘सशस्त्र सेना झंडा दिवस’ मनाता है। एक ऐसा गौरवपूर्ण अवसर जब राष्ट्र अपने वीर सेनानायकों को नमन करता है। यह दिन केवल कैलेंडर की तारीख नहीं, बल्कि देश के धड़कते दिल का वह पल है, जिसमें हम उन सैनिकों, वायुयोद्धाओं और नौसैनिकों के प्रति अपनी गहरी कृतज्ञता व्यक्त करते हैं, जिन्होंने हमारे आज की रक्षा के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया। जब लाल, गहरा नीला और हल्का नीला रंग वाला प्रतीक-झंडा देशभर में दिखाई देता है, तो वह महज़ तीन रंग नहीं होता। वह हमारी श्रद्धा, हमारे सम्मान और राष्ट्रीय कर्तव्य का मौन संदेश होता है - मानो कह रहा हो: “हम अपने रक्षकों को कभी नहीं भूलेंगे।” सशस्त्र सेना झंडा दिवस (Armed Forces Flag Day) केवल एक औपचारिकता नहीं; यह वह अवसर है जब पूरा देश अपने सैनिकों के अद्वितीय शौर्य, सर्वोच्च त्याग और सतत सेवा को नमन करता है। यह दिन हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा के कवच का सम्मान है और उस कवच की देखभाल का हमारा दायित्व भी। इतिहास की आधारशिला - एक राष्ट्रीय संकल्प इस ...