गणतंत्र का गौरव: अधिकारों के आकाश में कर्तव्यों की उड़ान
कर्तव्य पथ पर युवा भारत: संकल्प से सिद्धि का नया अध्याय
(प्रवीण कक्कड़)
26 जनवरी केवल राष्ट्रीय पर्व नहीं है। यह आत्म-मंथन का अवसर है, यह सोचने का कि एक नागरिक के रूप में हम अपने अधिकारों के प्रति जितने सजग हैं, क्या अपने कर्तव्यों के प्रति भी उतने ही उत्तरदायी हैं। इसी दिन भारत ने स्वयं को एक गणतांत्रिक राष्ट्र के रूप में स्थापित किया था। हमारे संविधान ने हमें केवल गणतंत्र नहीं दिया, बल्कि एक सशक्त, समावेशी और उत्तरदायी राष्ट्र के निर्माण की साझा जिम्मेदारी भी सौंपी।
आज जब भारत एक आधुनिक, आत्मनिर्भर और विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, तब यह जिम्मेदारी सबसे अधिक युवाओं के कंधों पर आ टिकती है। देश का वर्तमान भले ही अनुभव और परंपरा से संचालित हो, लेकिन उसका भविष्य युवाओं की सोच, उनके आचरण और उनके मूल्यों से ही आकार लेगा। गणतंत्र की मजबूती का असली पैमाना यही है कि उसका युवा वर्ग अधिकारों के साथ-साथ कर्तव्यों को कितनी गंभीरता से स्वीकार करता है।
कर्तव्य की पाठशाला: समाज की सामूहिक जिम्मेदारी
कर्तव्यों की समझ केवल पाठ्यपुस्तकों से नहीं आती। इसके लिए परिवार, समाज और संस्थाओं की साझा भूमिका आवश्यक है। युवाओं को यह बोध कराना होगा कि राष्ट्रप्रेम केवल नारों, प्रतीकों या सोशल मीडिया की अभिव्यक्तियों तक सीमित नहीं है। वह हमारे दैनिक आचरण में दिखाई देता है, अनुशासन में, ईमानदारी में और सामाजिक संवेदनशीलता में।
जब कोई युवा यातायात नियमों का पालन करता है, सार्वजनिक संपत्ति को अपनी संपत्ति की तरह सुरक्षित रखता है, पर्यावरण के प्रति सजग रहता है या समाज के वंचित वर्ग के लिए आगे आता है, तो वह प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से गणतंत्र की नींव को मजबूत करता है। यही छोटे-छोटे आचरण लोकतंत्र को व्यवहारिक रूप से जीवंत बनाते हैं।
अधिकार, कर्तव्य और रोजगार: परस्पर पूरक संबंध
समकालीन भारत में युवाओं के सामने सबसे बड़ा प्रश्न रोजगार का है। इस संदर्भ में अधिकार और कर्तव्य को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता। वास्तव में, कर्तव्य और रोजगार परस्पर पूरक हैं। यदि युवा शिक्षा, कौशल विकास और आत्म-अनुशासन को अपना प्राथमिक कर्तव्य मान लें, तो वे केवल रोजगार की प्रतीक्षा करने वाले नहीं रहेंगे, बल्कि नए अवसर सृजित करने वाले बन सकते हैं।
एक जिम्मेदार नागरिक ही एक कुशल पेशेवर बनता है। जब कोई युवा अपने कार्य को ईमानदारी और निष्ठा से करता है—चाहे वह छात्र हो, कर्मचारी हो, उद्यमी हो या किसान—तो वही उसका राष्ट्र के प्रति सबसे सार्थक योगदान होता है। राष्ट्र निर्माण केवल नीतियों या घोषणाओं से नहीं, बल्कि कार्यस्थलों पर निभाई गई जिम्मेदारियों से होता है।
डिजिटल युग और चुनौती
आज का युग सूचनाओं की तीव्रता का युग है। डिजिटल माध्यमों ने अभिव्यक्ति के नए अवसर दिए हैं, लेकिन इसके साथ ही भ्रम की चुनौतियाँ भी खड़ी की हैं। सोशल मीडिया पर क्षणिक लोकप्रियता और बिना जिम्मेदारी की अभिव्यक्ति कई बार युवा ऊर्जा को गलत दिशा में मोड़ देती है।
संविधान हमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है, किंतु यह स्वतंत्रता उत्तरदायित्व से अलग नहीं है। युवाओं को यह समझना होगा कि उनके अधिकार वहीं समाप्त होते हैं, जहाँ से दूसरों के अधिकार प्रभावित होने लगते हैं। असहमति लोकतंत्र की ताकत हो सकती है, पर अराजकता उसकी जड़ों को कमजोर करती है। आज आवश्यकता ऐसे युवाओं की है, जो डिजिटल मंचों पर प्रतिक्रिया देने से पहले संवैधानिक मर्यादाओं और सामाजिक प्रभावों पर विचार करें।
राष्ट्र निर्माण: हर युवा की भूमिका
राष्ट्र निर्माण केवल राजनीति या शासन की परिधि तक सीमित नहीं है। एक शिक्षक जो ईमानदारी से पढ़ाता है, एक डॉक्टर जो सेवा को सर्वोपरि रखता है, एक किसान जो कठिन परिस्थितियों में भी उत्पादन करता है, या एक युवा जो नवाचार के माध्यम से रोजगार के नए अवसर पैदा करता है वे सभी राष्ट्र निर्माता हैं।
यदि युवा यह संकल्प ले कि वह शॉर्टकट, असहिष्णुता और गैर-जिम्मेदार आचरण से दूरी बनाएगा, तो वही संकल्प भारत के भविष्य की सबसे ठोस आधारशिला बनेगा।
इस गणतंत्र दिवस पर आवश्यक है कि हम अधिकारों के उत्सव के साथ-साथ कर्तव्यों के निर्वहन को भी अपना गौरव बनाएं। जब युवा अपने व्यक्तिगत सपनों को राष्ट्र के दीर्घकालिक संकल्पों से जोड़ देगा, तब भारत के विकास पथ को कोई बाधा नहीं रोक पाएगी।
एक सशक्त गणतंत्र वही है, जहाँ युवा केवल प्रश्न नहीं पूछते, बल्कि समाधान की जिम्मेदारी भी उठाते हैं।
जय हिंद

बहुत सुन्दर..... आपकी तर्क शक्ति ब विचार प्रभावशील है.. I am impresh.
जवाब देंहटाएंबहुत सुन्दर..... आपकी तर्क शक्ति ब विचार प्रभावशील है.. I am impresh.
जवाब देंहटाएंAti sunder
जवाब देंहटाएंAti sunder
जवाब देंहटाएंRight sir, rights and duties are complementary to each other but these days only the rights are given priority to duties. Duties can be taught only through discipline which the society is lacking to a great extent. For inculcating the spirit of discipline, NCC is essential for every student. This write-up is of great significance to all💐
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