डिजिटल दुनिया, अकेले घर, दीवारों के बीच सिमटता संवाद
छतों की खुली दुनिया से स्क्रीन की बंद दीवारों में पहुंच गए हम (प्रवीण कक्कड़) आज के दौर में जब हम ‘ग्लोबल विलेज’ और ‘हाई-स्पीड कनेक्टिविटी’ की बात करते हैं, तो एक विरोधाभासी सत्य हमारे सामने खड़ा होता है। तकनीक ने सात समंदर पार बैठे व्यक्ति को तो एक क्लिक की दूरी पर ला दिया, लेकिन बगल के कमरे में बैठे अपने को कोसों दूर कर दिया है। हम एक ऐसे ‘डिजिटल टापू’ पर रहने लगे हैं, जहाँ शोर तो बहुत है, पर सुकून भरा संवाद गायब है। हम दुनिया से तो ‘जुड़े’ हैं, पर अपनों से ‘कटे’ हुए हैं। स्मृतियों की खुली छत बनाम चार इंच का कारावास बीते तीन दशकों में भारत के सामाजिक ढांचे में जो सबसे बड़ा बदलाव आया है, वह हमारे ‘बचपन’ के भूगोल में है। याद कीजिए 90 के दशक की वे गर्मियाँ, जब पारा चढ़ते ही नानी के घर जाने की तैयारियाँ शुरू हो जाती थीं। वह समय केवल छुट्टियों का नहीं, बल्कि रिश्तों के नवीनीकरण का उत्सव होता था। दोपहर में दादी की कहानियों का तिलिस्म और रात को छत पर बिछी चारपाइयों की कतार, यह केवल सोने का इंतज़ाम नहीं था, बल्कि एक सामूहिक संस्कार था। छत पर लेटकर तारों को निहारना, बिना घड़ी के समय का बह...