प्यास की दहलीज पर भविष्य: क्या पानी के लिए ज़मीन भी हाथ खड़े कर रही है?
'डे ज़ीरो' की आहट: एल-नीनो का दंश और प्रकृति का प्रकोप
(प्रवीण कक्कड़)
“पानी केवल एक संसाधन नहीं, बल्कि सभ्यता की सांस है।
जिस दिन यह सांस टूटेगी, विकास के सारे दावे धूल बन जाएंगे।”
हम अक्सर कहते हैं कि मौसम बदल गया है, गर्मियां अब पहले जैसी नहीं रहीं। पारा 45-46 डिग्री के पार पहुंचने लगा है, हवा में तपिश बढ़ गई है और प्रकृति के इस उग्र प्रकोप के सामने भर्ती का धैर्य जैसे टूटता जा रहा है। वैश्विक स्तर पर सक्रिय हुए एल-नीनो के दंश ने हमारे पूरे मौसम चक्र को बिगाड़ कर रख दिया है, लेकिन इस नाराजगी का सबसे भयावह चेहरा सिर्फ झुलसाती लू नहीं है।
असली डर उस खाली बर्तन और हांफते ट्यूबवेल का है, जो एक बूंद पानी के लिए चीख रहे हैं। जल संकट और 'डे ज़ीरो' की आहट अब कोई दूर की आशंका नहीं, बल्कि हमारे दरवाज़े पर खड़ी वर्तमान की सबसे कठोर सच्चाई है। हालात इतने विकराल हैं कि जिन शहरों को कभी “वाटर सरप्लस” कहकर सराहा जाता था, आज वहीं टैंकरों की अंतहीन कतारें और पानी के लिए संघर्ष करती पथरीली आंखें दिखाई दे रही हैं। ऐसा लगता है मानो सचमुच पानी देने से अब इस ज़मीन ने भी अपने हाथ खड़े कर दिए हैं।
हमने धरती को एक अंतहीन कमर्शियल बैंक समझ लिया, जिससे सिर्फ पानी 'विथड्रॉ' किया, कभी 'डिपॉजिट' नहीं किया। सेंट्रल ग्राउंड वॉटर बोर्ड (CGWB) के आंकड़े हमारी आंखें खोलने के लिए काफी हैं:
दुनिया का 25% भूजल:
अकेले भारत हर साल 230 से 240 अरब घन मीटर पानी ज़मीन से खींच रहा है।
54% जल स्रोत सूखे:
देश के आधे से अधिक पारंपरिक कुएं, बावड़ियां और तालाब दम तोड़ चुके हैं।
800 फीट की गहराई:
पहले जो पानी 40-50 फीट पर था, आज 600 से 800 फीट नीचे भी सिर्फ धूल उगल रहा है। वजह साफ़ है—शहरों के कंक्रीट जाल ने मिट्टी की सांसें बंद कर दी हैं, जिससे बारिश का पानी ज़मीन में रिस ही नहीं पाता।
इन्दौर से देश तक: ‘डे ज़ीरो’ की दस्तक
नीति आयोग ने जिस “Day Zero” (जब नलों में पानी पूरी तरह बंद हो जाए) की चेतावनी दी थी, वह देश के 21 बड़े शहरों की दहलीज़ पर आ चुका है।
हमारा इन्दौर और मालवा क्षेत्र, जो कभी अपनी समृद्ध जल-संरचनाओं के लिए प्रसिद्ध थे, आज सबसे संवेदनशील ज़ोन में हैं। मालवा की 'बेसाल्ट चट्टानें' भूजल सहेजने में नाज़ुक होती हैं। अंधाधुंध ट्यूबवेल माइनिंग के कारण इस गर्मी में कई इलाकों का वाटर लेवल 200 से 300 फीट तक नीचे गिर गया है। बढ़ते तापमान से नर्मदा का बैकवॉटर और बड़े जलाशय तेज़ी से वाष्पीकरण (Evaporation) का शिकार होकर पीछे सिकुड़ रहे हैं।
वैश्विक सच (UN-Water): पृथ्वी पर मात्र 2.5% पानी ही मीठा (पीने योग्य) है। खौफनाक बात यह है कि जो पानी बचा है, उसका भी 70% हिस्सा हमारे सीवेज और औद्योगिक कचरे के कारण प्रदूषित हो चुका है। संकट सिर्फ पानी की कमी का नहीं, 'साफ़ पानी' के अंत का है।
एल-नीनो का दंश और बदलता मौसम चक्र
इस महा-संकट के पीछे प्रकृति की नाराजगी और इंसानी लालच का खतरनाक कॉम्बिनेशन है। हालिया 'एल-नीनो' (El Niño) के प्रभाव ने प्रशांत महासागर को गर्म कर भारत के पूरे मानसून चक्र को अस्त-व्यस्त कर दिया। कमज़ोर बारिश, सर्दियों में गायब रही ठंड और समय से पहले आई रिकॉर्डतोड़ गर्मी ने ज़मीन की बची-कुची नमी को भी निचोड़ लिया। जब बारिश होती भी है, तो रीचार्ज सिस्टम न होने से पानी बह जाता है और हमारे नलकूप गर्मियों की शुरुआत में ही हांफने लगते हैं।
व्यर्थ बहता अमृत और सिकुड़ती नदियां
एक तरफ बूंद-बूंद की जंग है, दूसरी तरफ हमारी भयानक लापरवाही। केंद्रीय जल आयोग (CWC) के अनुसार, भारत की शहरी सप्लाई का करीब 40% पानी पाइपलाइनों के लीकेज और अनियंत्रित बर्बादी में बह जाता है। गाड़ियों को पाइप से धोना, सड़कों पर पानी छिड़कना—ये आदतें आने वाली पीढ़ी का हक छीनने जैसा अपराध हैं। गर्मी बढ़ने से जलाशयों से पानी उड़ने की रफ्तार 15 से 20% बढ़ गई है। नदियां सिकुड़ रही हैं और हमारा 'जल बैंक' खाली हो रहा है।
जल संरक्षण: अब विकल्प नहीं, राष्ट्रीय संस्कार
योजनाएं और बजट तब तक फेल रहेंगे, जब तक जल संरक्षण हमारा राष्ट्रीय संस्कार नहीं बनता। रेन वॉटर हार्वेस्टिंग को अब हर घर के लिए अनिवार्य कानूनी और नैतिक आदत बनना होगा। पुराने तालाब और बावड़ियां हमारा इतिहास नहीं, भविष्य हैं।
ठहरिए… सोचिए… और जागिए
कल सुबह जब आपके घर के नल से पानी की धार गिरे, तो उसे अपनी किस्मत समझिए। दुनिया में करोड़ों लोग ऐसे हैं जिनके दिन की शुरुआत एक बाल्टी पानी के संघर्ष से होती है। अगर आज हम नहीं संभले, तो इतिहास लिखेगा कि इंसान ने विकास की अंधी दौड़ में सब कुछ बचाया—सिवाय उस पानी के, जिससे जीवन था!


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