मानसून, जनभागीदारी और ‘हरियाली की विरासत’
पर्यावरण बचाने का सबसे सरल सूत्र: 'जिम्मेदारी मेरी भी' हर नागरिक बने ग्रीन गार्जियन , तभी बचेगा भविष्य ( प्रवीण कक्कड़) मानसून की पहली बारिश जब सूखी धरती को भिगोती है , तो वह केवल मौसम का बदलाव नहीं होता , बल्कि प्रकृति का एक संदेश भी होता है। यह संदेश हमें याद दिलाता है कि धरती , जल , वायु और हरियाली केवल संसाधन नहीं , बल्कि हमारी आने वाली पीढ़ियों की धरोहर हैं। पर्यावरण संरक्षण केवल सरकारों , नीतियों या अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों का विषय नहीं है। इसकी वास्तविक शुरुआत तब होती है जब प्रत्येक नागरिक स्वयं को प्रकृति का संरक्षक मानते हुए अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करता है। आज पर्यावरण को लेकर सबसे बड़ी चुनौती संसाधनों की कमी नहीं , बल्कि जिम्मेदारी की कमी है। हम स्वच्छ हवा चाहते हैं , पर्याप्त वर्षा चाहते हैं , हरियाली चाहते हैं , लेकिन यह भी चाहते हैं कि इसकी जिम्मेदारी कोई और निभाए। सच तो यह है कि जब तक हर व्यक्ति अपने हिस्से का योगदान नहीं देगा , तब तक कोई भी अभियान स्थायी सफलता हासिल नहीं कर सकता। मानसून का यह समय केवल पौधारोपण का मौसम नहीं , बल्कि संकल्प का मौसम...