किताबी ज्ञान में अव्वल, वास्तविक जिंदगी से अनजान
नई पीढ़ी को डिग्री के साथ दिशा की भी जरूरत
(प्रवीण कक्कड़)
नया शिक्षा सत्र शुरू हो गया है। भारत में आज शिक्षा पहले से कहीं अधिक सुलभ है। स्कूलों की संख्या बढ़ी है, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों का विस्तार हुआ है, और युवाओं के हाथों में डिग्रियों का अंबार लग रहा है। लेकिन इस चमक-दमक के बीच एक बुनियादी प्रश्न हमारे सामने खड़ा है, क्या हम वास्तव में शिक्षित हो रहे हैं, या केवल परीक्षा पास करने की कला सीख रहे हैं?
आज की शिक्षा व्यवस्था एक ऐसी दौड़ में बदलती जा रही है जहाँ गति तो है, लेकिन दिशा स्पष्ट नहीं है। हम बच्चों को कठिन सिद्धांत, लंबे पाठ्यक्रम और हर हाल में अव्वल आने का जुनून तो सिखा रहे हैं, लेकिन जीवन की वास्तविक चुनौतियों का सामना करने के लिए पर्याप्त रूप से तैयार नहीं कर पा रहे। स्कूल और कॉलेज से निकलकर जब युवा कार्यस्थल, व्यवसाय या सामाजिक जीवन में प्रवेश करता है, तो उसे अक्सर महसूस होता है कि किताबों में सीखी गई बातों और वास्तविक जीवन की अपेक्षाओं के बीच एक बड़ी खाई मौजूद है।
हमारे विद्यार्थी जटिल गणितीय समीकरण और ऐतिहासिक घटनाएँ याद कर लेते हैं, लेकिन संवाद कौशल, टीमवर्क, समय प्रबंधन, आर्थिक समझ, नेतृत्व और समस्या-समाधान जैसे जीवनोपयोगी कौशलों में पीछे रह जाते हैं। यही कारण है कि डिग्री हाथ में होने के बावजूद अनेक युवा व्यावहारिक चुनौतियों के सामने असहज दिखाई देते हैं।
आंकड़ों के आईने से
यह चिंता केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि आंकड़ों से भी प्रमाणित होती है। ASER 2024 के अनुसार विद्यालयों में नामांकन दर लगभग 98 प्रतिशत तक पहुँच चुकी है, लेकिन सीखने की गुणवत्ता अभी भी बड़ी चुनौती बनी हुई है। बड़ी संख्या में विद्यार्थी अपनी कक्षा से नीचे स्तर की पुस्तकें पढ़ने और बुनियादी गणितीय प्रश्न हल करने में कठिनाई महसूस करते हैं।
इसी प्रकार India Skills Report और विभिन्न रोजगार सर्वेक्षण बताते हैं कि स्नातक होने वाले युवाओं का बड़ा वर्ग उद्योगों और आधुनिक कार्यस्थलों की अपेक्षाओं के अनुरूप पूरी तरह तैयार नहीं है। समस्या ज्ञान की कमी नहीं, बल्कि उस ज्ञान को व्यवहार में उतारने की क्षमता की कमी है। राष्ट्रीय उपलब्धि सर्वेक्षण (NAS) भी संचार कौशल, नेतृत्व क्षमता और व्यावहारिक निर्णय लेने की दक्षता को लेकर चुनौतियों की ओर संकेत करता है।
दुनिया भी अब शिक्षा की नई परिभाषा लिख रही है। UNESCO की रिपोर्टें स्पष्ट रूप से बताती हैं कि भविष्य की शिक्षा केवल सूचना आधारित नहीं हो सकती। रचनात्मकता, आलोचनात्मक चिंतन, सहयोग, सांस्कृतिक समझ और व्यावहारिक कौशल ही आने वाले समय की सबसे बड़ी आवश्यकताएँ होंगी।
यदि हम अपने इतिहास की ओर देखें तो भारत की प्राचीन शिक्षा प्रणाली इस दृष्टि से कहीं अधिक संतुलित दिखाई देती है। तक्षशिला और नालंदा केवल शिक्षा संस्थान नहीं थे, बल्कि जीवन निर्माण के केंद्र थे। वहाँ ज्ञान के साथ कौशल, अध्ययन के साथ व्यवहार और शिक्षा के साथ चरित्र निर्माण पर भी जोर दिया जाता था। विद्यार्थी केवल जानकारी लेकर नहीं, बल्कि जीवन-दृष्टि लेकर निकलते थे।
इसके विपरीत, वर्तमान व्यवस्था बच्चों में प्रतिस्पर्धा तो पैदा कर रही है, लेकिन धैर्य और असफलता को स्वीकार करने की क्षमता विकसित नहीं कर पा रही। अंक और रैंक की दौड़ में बच्चे जीतना तो सीख रहे हैं, लेकिन हार से सीखना नहीं। परिणामस्वरूप छोटी-सी असफलता भी कई बार उनके आत्मविश्वास और मानसिक संतुलन को प्रभावित कर देती है।
विडंबना यह है कि हम बच्चों को प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया तो पढ़ाते हैं, लेकिन एक पौधा लगाकर उसे धैर्यपूर्वक विकसित करना नहीं सिखाते। हम आर्थिक सिद्धांत पढ़ाते हैं, लेकिन व्यक्तिगत बजट बनाना नहीं सिखाते। हम नागरिक शास्त्र पढ़ाते हैं, लेकिन सक्रिय नागरिक बनकर समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का अभ्यास नहीं कराते।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने इस समस्या को पहचाना है और कौशल विकास, अनुभवात्मक शिक्षा तथा समग्र मूल्यांकन पर विशेष जोर दिया है। यह एक सकारात्मक पहल है, लेकिन इसकी सफलता तभी संभव होगी जब स्कूल, परिवार और समाज मिलकर शिक्षा को जीवन से जोड़ने का प्रयास करें।
बच्चों को केवल पाठ्यपुस्तकों तक सीमित रखने के बजाय उन्हें घर के छोटे-छोटे कार्यों, वित्तीय समझ, सामाजिक उत्तरदायित्व, स्वयंसेवा, कला, खेल और स्थानीय समस्याओं के समाधान से जोड़ना होगा। शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी पाना नहीं, बल्कि जीवन को समझना और समाज में सार्थक योगदान देना होना चाहिए।
शायद अब समय आ गया है कि हम बच्चों से यह पूछना थोड़ा कम करें कि “आज स्कूल में क्या पढ़ाया गया?” और यह पूछना शुरू करें कि “आज तुमने जीवन और समाज से क्या नया सीखा?”
क्योंकि अंततः सफल वही नहीं होता जिसने सबसे अधिक किताबें रटी हों, बल्कि वह होता है जिसने सीखी हुई बातों को जीवन में उतारना सीख लिया हो। शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य जानकारी से भरा हुआ मस्तिष्क नहीं, बल्कि संवेदनशील, आत्मविश्वासी, संतुलित और जिम्मेदार नागरिक तैयार करना है। यदि हम आज इस प्रश्न पर गंभीरता से विचार कर सकें, तो आने वाली पीढ़ियों को केवल डिग्रियाँ ही नहीं, बल्कि जीवन में आगे बढ़ने की सही दिशा भी मिल सकेगी।


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