मेहनत पर 'माफिया' का राज, अनशन से 'इंसाफ' की आस

युवाओं के सपनों पर ‘लीक’ का ग्रहण

सोनम का सत्याग्रह और युवाओं के विश्वास की लड़ाई

(प्रवीण कक्कड़)

भारत में एक मध्यमवर्गीय परिवार अपने बच्चों को विरासत में जमीन-जायदाद से अधिक शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं का सपना देता है। यही वह रास्ता माना जाता है, जो बेहतर भविष्य के द्वार खोलता है। लेकिन जब परीक्षा से पहले ही प्रश्नपत्र बाजार में पहुंच जाएं, भर्ती प्रक्रियाएं वर्षों तक अदालतों में उलझी रहें और लाखों युवाओं की उम्र तैयारी करते-करते निकल जाए, तब केवल एक परीक्षा नहीं, बल्कि पूरे तंत्र की विश्वसनीयता कटघरे में खड़ी हो जाती है।

इसी चिंता के बीच दिल्ली के जंतर-मंतर से उठी एक आवाज देश का ध्यान अपनी ओर खींच रही है। लद्दाख के प्रसिद्ध शिक्षाविद्, नवाचारक और रेमन मैगसेसे पुरस्कार विजेता सोनम वांगचुक युवाओं के भविष्य और परीक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता की मांग को लेकर पिछले 21 दिनों से अनशन पर थे। शनिवार को स्वास्थ्य बिगड़ने पर पुलिस उन्हें जंतर-मंतर से सफदरजंग अस्पताल ले गई, जहां चिकित्सकीय निगरानी के बीच भी उनका अनशन जारी है। उनका यह कदम केवल एक परीक्षा या एक भर्ती प्रक्रिया का विरोध नहीं, बल्कि उस भरोसे को बचाने की कोशिश है जिस पर करोड़ों युवाओं का भविष्य टिका है।

हाल के वर्षों में देश ने कई बड़ी परीक्षाओं में पेपर लीक और अनियमितताओं के आरोप देखे हैं। मेडिकल, इंजीनियरिंग, भर्ती और प्रवेश परीक्षाओं से जुड़े विवादों ने युवाओं के मन में यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या केवल मेहनत ही सफलता की गारंटी है? लाखों विद्यार्थी वर्षों तक तैयारी करते हैं, परिवार अपनी बचत कोचिंग और शिक्षा पर खर्च करते हैं, लेकिन जब निष्पक्षता पर ही सवाल उठ जाए तो सबसे बड़ी क्षति विश्वास की होती है।

स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि NEET-UG 2024 के लिए 23.81 लाख विद्यार्थियों ने पंजीकरण कराया था, जो इस परीक्षा के इतिहास का सबसे बड़ा आंकड़ा था। एक ही परीक्षा से जुड़ी किसी भी अनियमितता का असर लाखों परिवारों की उम्मीदों पर पड़ता है।

जंतर-मंतर से उठी पारदर्शिता की गूंज

जंतर-मंतर पर शुरू हुआ यह आंदोलन अब अस्पताल तक पहुंच चुका है, लेकिन इसकी मूल मांग आज भी वही है, परीक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही। आंदोलन से जुड़े छात्र और समर्थक मानते हैं कि यदि परीक्षार्थियों से पूर्ण ईमानदारी की अपेक्षा की जाती है, तो परीक्षा प्रणाली को भी उतनी ही निष्पक्ष और पारदर्शी होना चाहिए। वांगचुक का अनशन इस पीड़ा को राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में लाने का प्रयास है। लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध और अनशन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का एक वैध माध्यम माना जाता है। इतिहास बताता है कि कई बार ऐसे आंदोलनों ने सरकारों को महत्वपूर्ण निर्णय लेने के लिए प्रेरित किया है।

ऐतिहासिक अनशन और उनके परिणाम

भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में कई अनशन ऐसे रहे हैं जिन्होंने व्यवस्था और नीति दोनों को प्रभावित किया। 1952 में पोट्टि श्रीरामुलु के अनशन ने आंध्र प्रदेश के गठन का मार्ग प्रशस्त किया। 2009 में के. चंद्रशेखर राव के अनशन ने तेलंगाना राज्य निर्माण की प्रक्रिया को गति दी। 2011 में अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन ने लोकपाल कानून की दिशा में राष्ट्रीय दबाव बनाया। ममता बनर्जी का सिंगूर आंदोलन भूमि अधिग्रहण के प्रश्न को राष्ट्रीय बहस में ले आया, जबकि 2024 में स्वयं सोनम वांगचुक के लद्दाख 'क्लाइमेट फास्ट' ने हिमालयी पर्यावरण और स्थानीय अधिकारों को वैश्विक चर्चा का विषय बनाया।

मणिपुर की इरोम शर्मिला का 2000 से 2016 तक चला अनशन दुनिया के सबसे लंबे लोकतांत्रिक आंदोलनों में गिना जाता है। AFSPA कानून के विरोध में लगभग 16 वर्षों तक चले उनके संघर्ष ने मानवाधिकार और नागरिक स्वतंत्रता के प्रश्न को राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रमुखता से उठाया।

लद्दाख से संवाद की पारिवारिक विरासत

अनशन की परंपरा सोनम वांगचुक के परिवार से भी जुड़ी रही है। उनके पिता सोनम वांग्याल ने 1984 में लद्दाख के समुदायों को अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा देने की मांग को लेकर भूख हड़ताल की थी। उस समय तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी स्वयं लेह पहुंचीं और संवाद के माध्यम से आंदोलन का समाधान खोजा गया। बाद में लद्दाख के समुदायों को ST का दर्जा मिला। यह उदाहरण बताता है कि लोकतंत्र में संवाद और संवेदनशीलता कितनी महत्वपूर्ण होती है।

हालांकि यह भी सच है कि जटिल प्रशासनिक और कानूनी समस्याओं का समाधान केवल आंदोलनों से नहीं निकलता। स्थायी सुधार के लिए संस्थागत बदलाव आवश्यक हैं। परीक्षा प्रणाली को तकनीक आधारित सुरक्षा उपायों, एन्क्रिप्टेड प्रश्नपत्र प्रबंधन, जवाबदेही तय करने वाली स्वतंत्र निगरानी व्यवस्था और पेपर लीक माफियाओं के खिलाफ कठोर दंडात्मक कार्रवाई की आवश्यकता है।

'विकसित भारत' और युवा शक्ति का भविष्य

भारत आज दुनिया की सबसे युवा आबादी वाले देशों में है। यह युवा शक्ति देश की सबसे बड़ी पूंजी है। यदि यही वर्ग अविश्वास, अनिश्चितता और निराशा में जीने लगे, तो 'विकसित भारत' का सपना कमजोर पड़ जाएगा। इसलिए यह मुद्दा केवल छात्रों का नहीं, बल्कि राष्ट्र के भविष्य का है।

आज भारत में हर वर्ष लाखों युवा प्रतियोगी परीक्षाओं के माध्यम से उच्च शिक्षा और रोजगार की दौड़ में शामिल होते हैं। केवल NEET जैसी परीक्षा में ही 23 से 24 लाख अभ्यर्थी भाग लेते हैं, जो कई देशों की कुल आबादी से अधिक है।

विश्वास को बचाने की साझा जिम्मेदारी

जंतर-मंतर से शुरू होकर अब अस्पताल तक पहुंचे इस आंदोलन और उसके समर्थन में उठ रही आवाजें हमें यही याद दिलाती हैं कि किसी भी देश की सबसे बड़ी ताकत उसके युवाओं का विश्वास होता है। सरकार, समाज और संस्थाओं की जिम्मेदारी है कि इस विश्वास को टूटने न दें।

क्योंकि जब करोड़ों युवाओं का भविष्य कुछ घंटों की परीक्षा पर निर्भर हो और उसी परीक्षा की निष्पक्षता संदेह के घेरे में आ जाए, तब संकट केवल शिक्षा व्यवस्था का नहीं, बल्कि राष्ट्र के सामाजिक विश्वास का बन जाता है। किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी पूंजी उसके युवा होते हैं। यदि उनके सपनों और मेहनत पर से भरोसा उठने लगे, तो विकास की सबसे मजबूत नींव भी कमजोर पड़ जाती है। इसलिए युवाओं के सपनों पर लगे इस ‘लीक’ के ग्रहण को हटाना केवल प्रशासनिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि राष्ट्रीय दायित्व है।


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