युवा सवालों से बदल रही राजनीति की दिशा

जनआंदोलन : सड़क पर उठे सवाल बदल देते हैं सियासत

(प्रवीण कक्कड़)

भारतीय राजनीति में इन दिनों एक दिलचस्प बदलाव दिखाई दे रहा है। अचानक युवा केवल भाषणों में देश का भविष्य नहीं रहा, वह राजनीतिक दलों के वर्तमान एजेंडे की प्राथमिकता बन गया है। सरकार कैंपस तक पहुँचने की रणनीति बना रही है, मंत्री विश्वविद्यालयों में युवाओं से संवाद करेंगे, सोशल मीडिया की भाषा और अंदाज बदल रहा है, राज्यों में Gen-Z से सीधे जुड़ने के कार्यक्रम तैयार हो रहे हैं। विपक्ष भी शिक्षा, परीक्षा, रोजगार और युवा आकांक्षाओं को अपनी राजनीतिक रणनीति के केंद्र में ला रहा है।

सवाल है - आखिर ऐसा अचानक क्यों? इसका एक बड़ा जवाब कुछ सप्ताह पीछे दिल्ली के जंतर-मंतर पर मिलता है। प्रतियोगी परीक्षाओं की गड़बड़ियों, पेपर लीक, रोजगार और जवाबदेही के सवालों पर खड़े हुए Gen-Z आंदोलन ने भले अपना धरना समाप्त कर दिया हो, लेकिन जाते-जाते उसने राजनीतिक दलों के सामने एक नया चुनावी सच रख दिया - इस पीढ़ी को नजरअंदाज करना अब आसान नहीं है।

दरअसल भारतीय लोकतंत्र में यह पहली बार नहीं हुआ। यहाँ चुनाव सरकार बदलते हैं, लेकिन कई बार आंदोलन राजनीति की दिशा बदल देते हैं। सड़क पर उठी आवाज संसद तक पहुँचती है और फिर वही मुद्दा राजनीतिक दलों की भाषा, घोषणापत्र और चुनावी रणनीति का हिस्सा बन जाता है। स्वतंत्र भारत का इतिहास ऐसी कई “आग” का साक्षी है।


1965 में तमिलनाडु का हिंदी-विरोधी आंदोलन भाषा और क्षेत्रीय अस्मिता के प्रश्न पर उभरा। छात्रों की बड़ी भागीदारी वाले इस आंदोलन के बाद 1967 में कांग्रेस का पुराना वर्चस्व टूटा और सी. एन. अन्नादुरै के नेतृत्व में डीएमके सत्ता में आई। आंदोलन ने केवल भाषा की बहस नहीं बदली, दक्षिण भारत की राजनीति का स्थायी समीकरण बदल दिया।

1974 में गुजरात का नवनिर्माण आंदोलन महंगाई और भ्रष्टाचार के खिलाफ छात्र असंतोष से शुरू हुआ। उसकी चिंगारी बिहार पहुँची और जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में “संपूर्ण क्रांति” का विशाल आंदोलन खड़ा हुआ। आपातकाल और उसके बाद बने राजनीतिक वातावरण में 1977 में पहली बार केंद्र में गैर-कांग्रेसी सरकार बनी। जेपी आंदोलन ने बताया कि युवा किसी आंदोलन की संख्या भर नहीं, सत्ता परिवर्तन की भूमिका भी लिख सकता है।

1979 से 1985 का असम आंदोलन इससे आगे गया। ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन के नेतृत्व में छह वर्ष चले आंदोलन के बाद असम समझौता हुआ। आंदोलन से निकले नेताओं ने असम गण परिषद बनाई और सत्ता तक पहुँचे। यानी आंदोलन मांग करते-करते स्वयं राजनीतिक विकल्प बन गया।

मंडल और मंदिर ने बदल दिया राजनीति का गणित

फिर आया 1990 का दौर। मंडल आयोग की सिफारिशों और उसके पक्ष-विपक्ष में हुई लामबंदी ने सामाजिक न्याय, OBC प्रतिनिधित्व और सत्ता में हिस्सेदारी को राजनीति के केंद्र में ला दिया। उसी समय राम जन्मभूमि आंदोलन ने सांस्कृतिक-धार्मिक पहचान को राष्ट्रीय राजनीति की बड़ी धुरी बनाया। मंडल और मंदिर ने मिलकर उत्तर भारत की राजनीति का पुराना गणित ही बदल दिया।

आंदोलन - दिल्ली की सड़क से केंद्र तक

2011 में अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन फिर दिल्ली की सड़कों से राजनीति के केंद्र तक पहुँचा। लोकपाल राष्ट्रीय मुद्दा बना और उसी आंदोलन से आगे चलकर आम आदमी पार्टी जैसी नई राजनीतिक शक्ति निकली। 2012 का निर्भया आंदोलन और अलग था। उसके पीछे न कोई राजनीतिक दल था, न कोई स्थापित नेतृत्व। फिर भी युवाओं और नागरिकों का स्वतःस्फूर्त आक्रोश इतना व्यापक हुआ कि महिला सुरक्षा राष्ट्रीय राजनीतिक एजेंडा बनी और आपराधिक कानूनों में महत्वपूर्ण बदलाव हुए। 2020-21 के किसान आंदोलन ने एक बार फिर यही सिद्धांत दोहराया। एक वर्ष से अधिक चले विरोध के बाद केंद्र सरकार को तीन कृषि कानून वापस लेने पड़े। संदेश साफ था - लोकतंत्र में बहुमत सरकार को निर्णय लेने की शक्ति देता है, लेकिन जनभावना को हमेशा अनसुना करने का अधिकार नहीं।

ऐतिहासिक युवा आंदोलन

इसी ऐतिहासिक क्रम में अब 2026 का युवा आंदोलन जुड़ गया है। उस आंदोलन की सफलता को केवल इस आधार पर नहीं मापा जाना चाहिए कि कौन-सा फैसला हुआ या किस मंत्री ने इस्तीफा दिया। उसका बड़ा राजनीतिक असर अब दिख रहा है, उसने Gen-Z को राजनीतिक दलों की प्राथमिकता बना दिया है। हाल के दिनों में भाजपा और सरकार की युवा-केंद्रित आउटरीच तेज हुई है। केंद्र स्तर पर विश्वविद्यालयों और युवाओं से सीधे संवाद की योजनाएँ सामने आई हैं, जबकि राज्यों में भी Gen-Z तक पहुँचने के विशेष प्रयास हो रहे हैं। कांग्रेस भी शिक्षा और परीक्षा व्यवस्था जैसे युवा-सरोकारों को प्रमुखता दे रही है। यानी सत्ता और विपक्ष दोनों ने संदेश पढ़ लिया है - युवा असंतोष अब केवल सोशल मीडिया ट्रेंड नहीं, राजनीतिक शक्ति भी बन सकता है।

एक हाथ में वोटर कार्ड, दूसरे में स्मार्टफोन

यह भारत की पहली विशाल मतदाता पीढ़ी है जिसके एक हाथ में वोटर कार्ड और दूसरे में स्मार्टफोन है। वह नेता का भाषण सुन सकती है और उसी समय उसका फैक्ट-चेक भी कर सकती है। पहले राजनीतिक दल संदेश बनाते थे और कार्यकर्ता उसे जनता तक पहुँचाते थे; आज एक छात्र का वीडियो, एक मीम, एक पॉडकास्ट या तीस सेकंड की रील लाखों लोगों के बीच राजनीतिक विमर्श खड़ा कर सकती है।

युवा अब पूछेगा - नौकरियाँ कहाँ हैं? भर्ती समय पर क्यों नहीं होती? परीक्षा का पेपर सुरक्षित क्यों नहीं है? डिग्री के बाद अवसर क्या है? AI और ऑटोमेशन के दौर में मेरा कौशल कहाँ खड़ा है? स्टार्टअप और स्वरोजगार के लिए वास्तविक व्यवस्था क्या है?

आंदोलन खत्म हो जाते हैं। धरने उठ जाते हैं। जंतर-मंतर फिर सामान्य हो जाता है। लेकिन सफल आंदोलन की असली पहचान यही है कि उसके जाने के बाद भी राजनीति पहले जैसी नहीं रहती

और शायद इस बार भी वही हो रहा है। भारत की राजनीति युवाओं की तरफ देख रही है - क्योंकि युवा अब केवल वोट देने वाली पीढ़ी नहीं, एजेंडा तय करने वाली पीढ़ी बनने की ओर है।

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