कंक्रीट का विस्तार और प्रकृति का अनुशासन

नेपाल की चेतावनी, भारत के लिए सबक 

(प्रवीण कक्कड़)

“विकास रोकना समाधान नहीं, विकास का भूगोल समझना और उसका सम्मान करना ही स्थायी समाधान है।”

नेपाल में आई हालिया विनाशकारी बाढ़ को केवल पड़ोसी देश की मौसमी त्रासदी मानकर आगे बढ़ जाना गंभीर भूल होगी। यह हिमालय से आया वह स्पष्ट संदेश है, जिसे भारत के संवेदनशील पर्वतीय राज्यों से लेकर तेजी से फैलते आधुनिक महानगरों तक पढ़ा जाना चाहिए। संदेश सीधा है, प्रकृति विकास की विरोधी नहीं है, लेकिन उसके प्राकृतिक जलमार्गों को अवरुद्ध करके खड़ा किया गया विकास  कभी पूरी तरह सुरक्षित नहीं हो सकता।

हिमालयी संकट और साझा चेतावनी

26 अगस्त को नेपाल के सीमावर्ती रासुवा क्षेत्र में आई विनाशकारी फ्लैश फ्लड ने भोटे कोशी और त्रिशूली नदी तंत्र को विकराल बना दिया। प्रारंभिक वैज्ञानिक आकलन ऊंचाई वाले क्षेत्र में बर्फ और चट्टानों के बड़े पैमाने पर धंसाव की ओर संकेत करते हैं। इस घटना ने हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियरों, ग्लेशियल झीलों और उनसे जुड़े GLOF यानी ‘ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड’ जैसे खतरों को फिर गंभीर चर्चा के केंद्र में ला दिया है।

चिंता इसलिए भी बड़ी है क्योंकि हिमालय तेजी से बदल रहा है। IIT रोपड़ और यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी सिडनी के संयुक्त अध्ययन के अनुसार, हिमाचल प्रदेश में ग्लेशियर झीलों की संख्या 1990 की 107 से बढ़कर 2024 में 669 हो गई, यानी करीब 525 प्रतिशत की वृद्धि। इनमें अनेक झीलें ऐसे कारकों के प्रति संवेदनशील पाई गई हैं, जो अचानक विनाशकारी बाढ़ का कारण बन सकते हैं।

इसलिए नेपाल की चेतावनी नेपाल तक सीमित नहीं है। हिमालय में पैदा हुआ जल संकट राजनीतिक और प्रशासनिक सीमाएं देखकर नहीं बहता। जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश जैसे क्षेत्रों में सैटेलाइट निगरानी, अर्ली वार्निंग सिस्टम, सेंसर नेटवर्क, सुरक्षित निकासी मार्ग और नियमित आपदा अभ्यास अब विकल्प नहीं, अनिवार्यता हैं। पहाड़ों में सड़क, बांध, सुरंग या हाइड्रोपावर परियोजना बनाते समय प्रश्न केवल यह नहीं होना चाहिए कि निर्माण संभव है या नहीं; प्रश्न यह भी हो कि प्रकृति के सबसे कठिन दिन में वह कितना सुरक्षित रहेगा।

पहाड़ों से महानगरों तक एक ही संदेश

क्या यह चेतावनी केवल हिमालय के लिए है? बिल्कुल नहीं। पहाड़ों में पानी ग्लेशियर और ढलानों से रास्ता मांगता है, शहरों में वही पानी नदियों, तालाबों, प्राकृतिक नालों और मिट्टी से रास्ता खोजता है। जब हम हर खाली जमीन पर कंक्रीट बिछाते हैं, प्राकृतिक नालों को संकरा या बंद करते हैं और जलस्रोतों के कैचमेंट क्षेत्र में निर्माण बढ़ाते हैं, तो सामान्य वर्षा भी असामान्य जलभराव में बदल सकती है।

पहले पानी का नक्शा, फिर विकास का नक्शा

यहीं नेपाल का सबक भारत के तेजी से बढ़ते महानगरों और विशेष रूप से इंदौर से जुड़ता है। देश के सबसे गतिशील शहरों में अग्रणी इंदौर आज सुपर कॉरिडोर, रिंग रोड्स, मेट्रो, नई टाउनशिप और उपनगरों के साथ महानगरीय स्वरूप ले रहा है। यह विकास स्वागत योग्य है, लेकिन भविष्य के इंदौर का मास्टर प्लान केवल ऊपर उठती इमारतों का नहीं, नीचे बहते पानी का भी होना चाहिए।

मालवा के पठार पर बसे इंदौर में प्राकृतिक ढलान हैं। कान्ह और सरस्वती नदी तंत्र, सिरपुर और यशवंत सागर जैसे रामसर वेटलैंड्स तथा पिपलियापाला जैसे महत्वपूर्ण शहरी जलस्रोत इसकी जल-पारिस्थितिकी के महत्वपूर्ण घटक हैं। इनके प्राकृतिक प्रवाह, कैचमेंट और जलधारण क्षमता का संरक्षण भविष्य की शहरी सुरक्षा से सीधे जुड़ा है।

इसलिए नए इंदौर का मंत्र होना चाहिए, ‘पहले पानी का नक्शा, फिर विकास का नक्शा।’ हर बड़ी नई परियोजना से पहले माइक्रो-वाटरशेड और प्राकृतिक ड्रेनेज की मैपिंग हो। स्टॉर्म-वाटर ड्रेनेज और सीवरेज नेटवर्क यथासंभव अलग हों। फुटपाथ, पार्किंग और खुले सार्वजनिक क्षेत्रों में पोरस कंक्रीट या Permeable Pavement को बढ़ावा मिले, ताकि बारिश का पानी तेजी से बहकर बोझ बनने के बजाय जमीन में समाकर भूजल को समृद्ध करे।

‘स्पंज सिटी’ और नागरिकों की भागीदारी

यही ‘स्पंज सिटी’ की संकल्पना है, ऐसा शहर जो बारिश को समस्या मानकर जल्द से जल्द बाहर निकालने के बजाय उसका पानी सोखे, सहेजे, जमीन में उतारे और अतिरिक्त पानी को सुरक्षित रास्ता दे। इसके लिए पार्क, हरित क्षेत्र, तालाब, रेन गार्डन, रिचार्ज जोन और प्राकृतिक नाले उतने ही महत्वपूर्ण हैं जितनी सड़कें और फ्लाईओवर।

लेकिन सारी जिम्मेदारी सरकार की नहीं है। हर नागरिक भी समाधान का हिस्सा बन सकता है। घरों और संस्थानों में रेनवाटर हार्वेस्टिंग चालू रखना, सोसायटियों में पूरी जमीन कंक्रीट से न ढंकना, रिचार्ज क्षेत्र छोड़ना, नालों में कचरा न डालना और तालाबों तथा प्राकृतिक जलमार्गों पर अतिक्रमण के प्रति सजग रहना छोटी दिखने वाली लेकिन महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां हैं।

इंदौर ने जनभागीदारी और प्रशासनिक इच्छाशक्ति से स्वच्छता को जन-आंदोलन बनाकर देश को रास्ता दिखाया है। अब उसके सामने अगला अवसर ‘जल-सुरक्षित और प्रकृति-अनुकूल महानगर’ का राष्ट्रीय मॉडल प्रस्तुत करने का है।

नेपाल की त्रासदी का सबसे बड़ा सबक यही है कि विकास और प्रकृति में संघर्ष अनिवार्य नहीं है। जरूरत प्रकृति को रोकने की नहीं, उसे समझने की है। नदी का रास्ता कागजी नक्शों पर मिटाया जा सकता है, प्रकृति की स्मृति से नहीं क्योंकि 

जिस दिन प्रकृति अपना पुराना रास्ता वापस मांगती है, उस दिन सबसे महंगा कंक्रीट भी बेअसर साबित होता है।

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