दीपावली पर घर ही नहीं, जीवन भी रोशन हो


दूरियाँ मिटाएँ, संवाद बढ़ाएँ और खुशियों मनाएँ

(प्रवीण कक्कड़)

दीपों की रोशनी से दिशाएँ जगमगाती हैं,

प्रेम और विश्वास से ज़िंदगियाँ मुस्कुराती हैं 

दीपावली पर हम घरों की सफाई करते हैं, लेकिन क्या कभी मन में जमा अहंकार, रिश्तों में आई दूरियाँ और व्यवहार में बढ़ती कड़वाहट को साफ करने का विचार करते हैं? आज घर बड़े हो रहे हैं, लेकिन परिवार छोटे; संपर्क बढ़ रहे हैं, लेकिन संवाद घट रहे हैं। सोशल मीडिया पर हजारों शुभकामनाएँ भेजने वाले हम, कभी अपने ही घर में बैठे व्यक्ति का हाल पूछना भूल जाते हैं। आर्थिक समृद्धि की दौड़ में भावनात्मक संपन्नता कहीं पीछे छूट रही है। ऐसे समय में दीपावली केवल उत्सव नहीं, आत्ममंथन का अवसर है। क्यों न इस बार घर के साथ अपने विचार, व्यवहार और संबंधों को भी रोशन करें?

परंपरा में छिपा जीवन का दर्शन

दीपावली भगवान श्रीराम के अयोध्या लौटने की स्मृति से जुड़ी है। जैन परंपरा में भगवान महावीर का निर्वाण और सिख परंपरा में बंदी छोड़ दिवस भी इसी उत्सव से जुड़े हैं। इन परंपराओं का साझा संदेश है अंधकार पर प्रकाश और बंधन पर मुक्ति।

धनतेरस स्वास्थ्य एवं समृद्धि, नरक चतुर्दशी बुराइयों से मुक्ति, दीपावली सुख-समृद्धि, गोवर्धन पूजा प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और भाई दूज रिश्तों के स्नेह का संदेश देती है। इन पाँच दिनों में जीवन के पाँच आधार छिपे हैं - स्वास्थ्य, सदाचार, समृद्धि, प्रकृति और संबंध। इन्हें जीवन में उतारना ही उत्सव की सार्थकता है।

घर के साथ मन की सफाई

धूल घर को मैला करती है, अहंकार संबंधों को। इस दीपावली किसी पुरानी नाराजगी को समाप्त कीजिए। जहाँ गलती हुई है, क्षमा माँगिए; जहाँ चोट पहुँची है, क्षमा कीजिए। याद रखिए, झुकने से व्यक्ति छोटा नहीं होता, रिश्ते बड़े होते हैं।

अपनों को उपहार नहीं, समय दीजिए

आज महंगे उपहारों की चमक में आत्मीयता खो रही है। माता-पिता के पास बैठिए, पुराने मित्र को फोन कीजिए, किसी नाराज रिश्तेदार से पहल करके मिलिए। उपहार की कीमत भुलाई जा सकती है, लेकिन अपनापन जीवनभर याद रहता है।

परिवार में संवाद के दीप जलाइए

एक ही घर में रहकर भी मोबाइल की स्क्रीन हमें अलग-अलग संसारों में बाँट रही है। इस दीपावली कुछ घंटे स्क्रीन से दूर रहिए। बच्चों को सुनिए, बुजुर्गों के अनुभव जानिए। परिवार साथ रहने से नहीं, एक-दूसरे के लिए समय निकालने से मजबूत होता है।

समृद्धि के साथ संतोष भी कमाइए

धन आवश्यक है, लेकिन जीवन का अंतिम लक्ष्य नहीं। बड़ी उपलब्धियाँ भी अर्थहीन हैं, यदि उन्हें बाँटने वाले अपने ही दूर हो जाएँ। कमाई के साथ स्वास्थ्य, ईमानदारी, मानसिक शांति और संबंधों की पूँजी भी बढ़ाइए। यही वास्तविक लक्ष्मी है।

किसी दूसरे की दीपावली भी रोशन कीजिए

त्योहार की खुशी केवल अपने घर तक सीमित क्यों रहे? किसी जरूरतमंद की सहायता कीजिए, अकेले बुजुर्ग से मिलिए, कर्मचारियों के योगदान का सम्मान कीजिए। दान केवल धन का नहीं, समय, सम्मान और संवेदना का भी होता है।

उत्सव मनाइए, जिम्मेदारी भी निभाइए

दिखावे की प्रतिस्पर्धा और अनावश्यक खर्च से बचिए। स्थानीय कारीगरों से खरीदारी कीजिए, पर्यावरण का ध्यान रखिए। त्योहार ऐसा हो जिसमें अपनी खुशी के साथ पड़ोसी की शांति और समाज का हित भी सुरक्षित रहे।

स्वयं को बदलने का संकल्प लीजिए

हर दीपावली नया सामान खरीदते हैं, इस बार कोई नई अच्छी आदत अपनाइए। क्रोध कम कीजिए, स्वास्थ्य सुधारिए, समय का सम्मान कीजिए। परिवर्तन की शुरुआत दूसरों से नहीं, स्वयं से कीजिए। यही आत्मप्रकाश है।

प्रकाश का वास्तविक अर्थ

इस दीपावली यह मत गिनिए कि कितने दीप जलाए, यह देखिए कि कितनी दूरियाँ मिटाईं, कितने रिश्ते सँवारे और कितने चेहरों पर मुस्कान लाई।

दीपक का उजाला रातभर रहता है, लेकिन अच्छे कर्मों और सुंदर व्यवहार का प्रकाश पीढ़ियों तक रहता है।

इस बार दीपावली केवल मनाइए मत, अपने जीवन और व्यवहार में उतारिए।

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