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अतीक के प्रकरण में अपराध शास्त्र को भी समझना होगा

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(प्रवीण कक्कड़) अतीक अहमद का खात्मा हो गया। उसके साथ बहुत से दूसरे गुंडों को भी एनकाउंटर में मार गिराया गया। इस पूरे प्रकरण पर जमकर राजनीति हुई। राजनीति दो पक्षों में विभक्त दिखाई दी। राजनीति होना लाजमी है। क्योंकि जो व्यक्ति 5 बार विधायक रहा हो और सांसद चुना गया उसकी हत्या को राजनीतिक नजरिए से देखना जरूरी हो जाता है। लेकिन हम यहां राजनीति की बात नहीं कर रहे। वह एनकाउंटर जायज हैं या नाजायज। कस्टोडियल हत्या अचानक हुई या सुनियोजित। इस मुद्दे पर बहस करना उन लोगों का काम है जिनके अपने राजनीतिक पूर्वाग्रह हैं। लेकिन अतीक के प्रकरण को उसके अतीत को ध्यान में रखते हुए, सामाजिक नजरिए से देखना बहुत जरूरी है। यह इसलिए भी जरूरी है क्योंकि अतीक जैसे प्रकरण समाज की दिशा और दशा तय कर रहे हैं। अतीक अहमद की एक साधारण व्यक्ति से खूंखार गुंडा बनने की कहानी बहुत लंबी है। लुब्बेलुबाब यह है कि छोटे-मोटे अपराध करने वाला एक अपराधी राजनीतिक संरक्षण पाकर वर्चस्व के पायदान पर चढ़ता गया और विधायक फिर सांसद बन गया। सारे देश में अपराध का यही तरीका है। कोई भी अपराधी लगातार पनपता रहता है। और बाद में समाज में उसकी स्व...

आंतरिक रंगों को पहचानें, बाहर की दुनिया रंगीन हो जाएगी

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(प्रवीण कक्कड़) होली दहन कैसे शुरू हुआ यह कहानी पौराणिक है और जन जन को ज्ञात है कि हिरण्यकश्यप का पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु का भक्त था। उसने अपने पिता के बार-बार समझाने के बाद भी भगवान विष्णु की भक्ति नहीं छोड़ी। हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद को मारने के अनेक उपाय किए किंतु वह सफल नहीं हुआ। अंत में, उसने अपनी बहन होलिका से कहा कि वह प्रह्लाद को लेकर अग्नि में बैठे, क्योंकि होलिका को आग में न जलने का वरदान प्राप्त था इसलिए होलिका प्रहलाद को लेकर चिता मे जा बैठी परन्तु भगवान विष्णु की कृपा से प्रहलाद सुरक्षित रहे और होलिका जल कर भस्म हो गई । तब से होलिका-दहन का प्रचलन हुआ। जीवन भी ऐसा ही है। जीवन में हमेशा छल और कपट की होलिका का दहन होकर ही रहता है। जब छल इतना बढ़ जाए कि एक पिता अपने पुत्र को और एक बुआ अपने भतीजे को अग्नि में भस्म करने के लिए प्रवृत्त हो उठे तो होलिका दहन घटित हो ही जाता है। इसलिए होलिका दहन हमें बताता है कि अंत में झूठ, कपट और दुष्ट चरित्र की होलिका का दहन होना अवश्यंभावी है। होली को गिले-शिकवे भुलाने का त्यौहार भी कहा जाता है, इस दिन एक-दूसरे को रंग लगाकर जैसे हम पुराने मन...

देवाधिदेव शंकर : जिनका दर्शन ही निर्वाण है

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  (प्रवीण कक्कड़ ) नमामीशमिशान निर्वाण रूपं विभुं व्यापकं ब्रह्म वेद: स्वरुपम्। निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं चिदाकाश मकाशवासं भजेऽहम्‌ ॥ जिसका रूप ही निर्वाण हो। जो अखिल ब्रह्मांड में व्याप्त हो। जो चर अचर सब में हो। जो केवल सत्य हो और सत्य होने के कारण ही सुंदर हो। वह तो आदिदेव शंकर ही हैं। शंकर अनादि हैं। उनके जीवन मरण का कोई प्रश्न ही नहीं। जब वाद से तत्व बोध हो जाए। और तत्व बोध से सत्य का बोध हो जाए। तभी तो वह चंद्रचूड़ अर्थात शिव होता है। वादे-वादे जायते तत्त्वबोधः। बोधे-बोधे भासते चन्द्रचूडः॥  शिव हमारी आस्था के प्रतीक ही नहीं हैं बल्कि वह प्रकृति के प्रतीक हैं। उन्होंने गंगा को शिरोधार्य करके इस पूरे पृथ्वीलोक को हरा-भरा रहने का वरदान दिया। हिमालय से निकलने वाली गंगा के कैचमेंट में भारत की जनसंख्या के लगभग 40 करोड़ लोग रहते हैं। गंगा का मैदान दुनिया का सबसे उपजाऊ कृषि क्षेत्र है। इस आर्यावर्त को भगवान भोले शंकर ने ही बनाया है। इस पृथ्वी पर जो भी ज्ञान है, कला है, विज्ञान है वह शिव की देन है। शिव नटराज हैं। नाट्य शास्त्र में शिव का वर्णन है। नृत्य की जितनी मुद्राएं ह...

वैलेंटाइंस डे - यह दुनिया प्रेम से भरी है

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(प्रवीण कक्कड़) प्रेम दिवस पर भावनाओं के प्रकटन का सैलाब उमड़ पड़ता है। प्रेमी युगल एक दूसरे से प्रेम का इजहार करते हैं। बाजार ने इसे एक बड़ा अवसर बना दिया है। पूंजीवाद ने प्रेम और अध्यात्म के प्रतीक इस दिवस का भी भूमंडलीकरण कर दिया है। कभी रोम साम्राज्य ने संत वैलेंटाइंस को बंदी बना लिया था। तो उन्होंने प्रेम का संदेश दिया। यह बड़े आश्चर्य का विषय है कि हम प्रेम को खारिज करते हैं और नफरत को पोषित करते हैं। संत वैलेंटाइंस ने इसी प्रेम की तरफ समाज को मोड़ने की कोशिश की। आज 14 फरवरी प्रेम दिवस के रूप में तो मनाया जाता है किंतु इसका आशय सर्वथा भिन्न होता जा रहा है। समाज को प्रेम दिवस को जिस रूप में ग्रहण करना चाहिए उससे अलग रूप में इसे ग्रहण किया गया है। ऐसा प्रेम जो शारीरिक स्तर का न होकर आत्मिक स्तर का हो वह स्थाई है।  दैहिक आकर्षण स्थाई नहीं होता। देह एक ऐसी मृग मरीचिका है, जिसका कोई ओर-छोर नहीं है। प्रेम यदि करना है तो उसमें बेहतर होना ही पड़ेगा और बेहतर तभी हुआ जा सकता है जब देहेतर हुआ जाए। क्योंकि देहानुराग आतुरता, मोह और शरीर तक सीमित है। जैविक जरूरतों तक सीमित है, इसीलिए संत व...

भारत का अद्भुत गणतंत्र, जिसकी खूबसूरती है "अनेकता में एकता"

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  (प्रवीण कक्कड़)  गणतंत्र दिवस पर एक सवाल सबके जेहन में होता है आखिर इतनी विविधता के बाद भी भारत एक गणतंत्र के रूप में एक कैसे है. वह कौन सा राग भैरवी है जो इन सारे सरगम के सुरों को एक कर देता है. आखिर इतने वैविध्य के बावजूद एक कैसे है भारत. इसका सवाल हजारों वर्ष प्राचीन उस इंसानी सभ्यता में छुपा हुआ है जो इस धरती पर तब जन्मी जब दुनिया के अधिकांश भाग आदिम युग में ही थे. जब दुनिया इंसान के रूप में विकसित हो रही थी तब भारत एक इंसानी सभ्यता के रूप में विकसित हो चुका था. जब दुनिया शक्तिशाली साम्राज्यों के नीचे एकत्र हो रही थी उस समय भारत में गणराज्य विकसित हो चुके थे. वैशाली जैसे गणराज्य दुनिया के नक्शे पर आ चुके थे. शायद यही कारण है कि भारत का गणतंत्र भारत की ही नहीं कि विश्व की पहचान है. यह धरती पर सबसे विविधता पूर्ण और सबसे अनूठा गणतंत्र है. जितनी भाषा, जितनी संस्कृति और जितने धर्म भारत की धरती पर हैं उतने दुनिया में किसी और जगह नहीं मिलते. हमारा गणतंत्र निश्चित रूप से हमारी अलग पहचान है. यह कहना न्याय संगत नहीं है कि गणतंत्र की अवधारणा हमने अपने संविधान को आत्मसात करने के बाद...

जीवन प्रबंधन की कला सिखाती है मकर संक्रांति

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   (प्रवीण कक्कड़) मकर संक्रांति पूरे देश में हर्षोंल्लास से मनाया जा रहा है। सूर्यदेव की अराधना, तिल-गुड़ खाने और पतंग उड़ाने के साथ ही मकर संक्रांति पर्व कई संदेश देता है, हमें जीवन प्रबंधन की कला सिखाता है। संक्रांति यानी सूर्य का उत्तरायण, सूर्य धीरे-धीरे दक्षिण से उत्तर की ओर बढ़ने लगते हैं। जो हमें जीवन में सकारात्मकता लाने और प्रकाश की ओर बढ़ने का संकेत देता है। तिल-गुड़ के संगम से संगठन की क्षमता, लोहड़ी की अग्नि में क्रोध और ईर्ष्या को जलाना और पतंगबाजी से जीवन में उल्लास लाने व खुशियां बांटने के संदेश मिलते हैं। सूर्य के धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश को मकर संक्रांति कहा जाता है। देश के अधिकांश हिस्सों में इसे मकर संक्रांति ही कहा जाता है, वहीं इसकी पूर्व संध्या पर उत्तर भारत के कई क्षेत्रों में लोहड़ी पर्व मनाया जाता है, वहीं दक्षिण भारत में इसे पोंगल के रूप में मनाया जाता है। हर भारतीय त्यौहार का एक वैज्ञानिक महत्व है, हमारा हर पर्व रहन-सहन, खान-पान, फसलों व प्रकृति के परिवर्तनों पर आधारित है। हमारे पर्वों में जहां पौराणिक कथाओं का उल्लेख मिलता है, वहीं खगोलीय घट...

स्वामी विवेकानंद के आदर्शों ने आधुनिक भारत को दी नई दिशा

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  (प्रवीण कक्कड़) स्वामी विवेकानंद एक ऐसे व्यक्ति जिन्होंने देश के आध्यात्म, शिक्षा और स्वाभिमान को विश्व पटल पर अंकित किया। करीब 118 वर्ष पहले अमेरिका के शिकागो में हुए उनके भाषण को आज भी याद किया जाता है। वास्तव में स्वामी विवेकानंद आधुनिक भारत के वे आदर्श प्रतिनिधि हैं। जिनकी प्रेरणाएं हमें आज भी मार्ग दिखाती हैं। शिकागो में जब विवेकानंद को दुनिया ने सुना तो जाना कि भारत की धरती पर एक ऐसा व्यक्तित्व पैदा हुआ है जो दिशाहारा मानवता को सही दिशा देने में समर्थ है। शिकागो में विवेकानंद ने कहा था "मुझे गर्व है कि मैं उस धर्म से हूं जिसने दुनिया को सहिष्णुता और सार्वभौमिक स्वीकृति का पाठ पढ़ाया है। हम सिर्फ़ सार्वभौमिक सहिष्णुता पर ही विश्वास नहीं करते बल्कि, हम सभी धर्मों को सच के रूप में स्वीकार करते हैं। मुझे गर्व है कि मैं उस देश से हूं जिसने सभी धर्मों और देशों के सताए गए लोगों को अपने यहां शरण दी"। इसका अर्थ यह है कि विवेकानंद भी भारत की सहिष्णुता और सर्वधर्म समभाव को भारत की सबसे बड़ी पूंजी मानते थे। वसुधैव कुटुम्बकम की अवधारणा को दुनिया से परिचित कराने में विवेकानंद का अभ...