सस्टेनेबल लिविंग का सबसे बड़ा उदाहरण हैं आदिवासी परंपराएँ
9 अगस्त : विश्व आदिवासी दिवस पर विशेष
( प्रवीण कक्कड़ )
"जब आप किसी आदिवासी समुदाय को देखते हैं, तो आप केवल लोगों का एक समूह नहीं देखते, बल्कि हजारों वर्षों से प्रकृति के साथ संतुलित जीवन जीने वाली एक जीवंत सभ्यता को देखते हैं। उन्हें समझने के लिए केवल आँखें नहीं, हृदय की दृष्टि चाहिए।"
9 अगस्त को पूरा विश्व आदिवासी दिवस मना रहा है। इस वर्ष संयुक्त राष्ट्र ने इसकी थीम "स्वदेशी (आदिवासी) दाइयों का सम्मान: जीवन और कल्याण की सुरक्षा" निर्धारित की है। यह थीम केवल मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है, बल्कि आदिवासी समाज के उस पारंपरिक ज्ञान, जीवनशैली और प्रकृति के साथ उनके गहरे रिश्ते को सम्मान देने का संदेश भी देती है। वास्तव में यही वह ज्ञान है, जिसने सदियों से मानव और प्रकृति के बीच संतुलन बनाए रखा है। भारत के आदिवासी समाज को करीब से देखने का अवसर मिलने के कारण मुझे हमेशा लगा है कि यह थीम हमारे जनजातीय जीवन पर भी पूरी तरह सार्थक बैठती है।
अलीराजपुर की धरती पर पहला कदम
विश्व आदिवासी दिवस पर मेरा मन अनायास ही चार दशक पीछे लौट जाता है, जब एक युवा सब-इंस्पेक्टर के रूप में मैंने अलीराजपुर की धरती पर पहला कदम रखा था। तब अलीराजपुर, झाबुआ जिले का हिस्सा था और यह क्षेत्र देश के सबसे चुनौतीपूर्ण इलाकों में गिना जाता था। वर्दी की अपनी जिम्मेदारियाँ थीं, लेकिन उस धरती ने मुझे जो सिखाया, वह किसी प्रशिक्षण संस्थान या पुस्तक में नहीं मिल सकता था।
मैंने अपनी आँखों से देखा कि अपराध केवल कानून-व्यवस्था का विषय नहीं होता, बल्कि अभाव, अशिक्षा और अवसरों की कमी से भी जन्म लेता है। कई गाँव ऐसे थे जहाँ न सड़क थी, न अस्पताल और न ही बच्चों के लिए शिक्षा की पर्याप्त व्यवस्था। लोगों का भरोसा अदालतों से अधिक गाँव के पंच और जंगल की परंपराओं पर था। महिलाओं के कंधों पर परिवार, खेती और आजीविका की बड़ी जिम्मेदारी थी, लेकिन उन्हें अवसर और संसाधन बहुत सीमित मिले थे।
लेकिन इसी कठोर यथार्थ के बीच मैंने जीवन का सबसे सुंदर पक्ष भी देखा। भगोरिया मेले में मांदल की थाप पर झूमते युवा, प्रकृति के प्रति अगाध आस्था, सामुदायिक जीवन का अनुशासन, सीमित संसाधनों में संतोष और जंगल से उतना ही लेना जितनी आवश्यकता हो-यह सब मेरे लिए किसी पाठशाला से कम नहीं था। वे पेड़ों को जीवित आत्मा, नदियों को माँ और पहाड़ों को देवता मानते हैं। आज जब पूरी दुनिया "सस्टेनेबल लिविंग" और जलवायु परिवर्तन की चिंता कर रही है, तब महसूस होता है कि आदिवासी समाज सदियों से प्रकृति के साथ संतुलित जीवन जीने की वह कला जानता है, जिसकी तलाश आधुनिक दुनिया अब कर रही है।
चार दशकों में परिवर्तन
समय के साथ मेरी भूमिका बदली। पुलिस अधिकारी के रूप में मैंने समस्याओं को जमीन पर देखा और बाद में केंद्रीय मंत्री तथा मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री के विशेष कर्तव्यस्थ अधिकारी (OSD) के रूप में नीतियों को बनते और लागू होते भी देखा। दिल्ली और भोपाल की बैठकों में जब आदिवासी क्षेत्रों के विकास की योजनाओं पर चर्चा होती थी, तब मेरे सामने अलीराजपुर और झाबुआ के वही चेहरे आ खड़े होते थे। मुझे पता था कि एक सड़क केवल डामर की पट्टी नहीं होती, बल्कि किसी बीमार बच्चे के समय पर अस्पताल पहुँचने की उम्मीद होती है। एक विद्यालय केवल भवन नहीं होता, बल्कि पीढ़ियों के भविष्य का द्वार होता है।
इन चार दशकों में परिवर्तन स्पष्ट दिखाई देता है। जहाँ कभी शिक्षा का अभाव था, वहाँ आज आवासीय विद्यालय और उच्च शिक्षा के अवसर बढ़े हैं। स्वयं सहायता समूहों ने हजारों आदिवासी महिलाओं को आर्थिक आत्मविश्वास दिया है। जिन युवाओं के सामने कभी सीमित विकल्प थे, आज उनमें से अनेक सेना, पुलिस, शिक्षा, प्रशासन और खेल के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धियाँ हासिल कर रहे हैं। यह परिवर्तन सरकारों, समाज और स्वयं आदिवासी समुदाय के सामूहिक प्रयासों का परिणाम है।
यात्रा अभी अधूरी है
फिर भी यह स्वीकार करना होगा कि यात्रा अभी अधूरी है। आज भी अनेक क्षेत्रों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की पहुँच, भौगोलिक कठिनाइयाँ, पलायन और योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन जैसी चुनौतियाँ मौजूद हैं। सबसे बड़ी चिंता यह है कि आधुनिकता की अंधी दौड़ कहीं उनकी सांस्कृतिक पहचान और पारंपरिक ज्ञान को कमजोर न कर दे। विकास आवश्यक है, लेकिन ऐसा विकास नहीं जो अपनी जड़ों को ही काट दे…
आज आवश्यकता सहानुभूति की नहीं, सम्मान की है। आदिवासी समाज को केवल "पिछड़ा" कहकर नहीं समझा जा सकता। जल संरक्षण, जैव विविधता, प्राकृतिक संसाधनों के संतुलित उपयोग, सामुदायिक जीवन और पर्यावरण संरक्षण का उनका अनुभव पूरी दुनिया के लिए प्रेरणा है। उनके हस्तशिल्प, लोककला, लोकभाषाओं और पारंपरिक ज्ञान को केवल विरासत मानकर सुरक्षित रखने की नहीं, बल्कि आधुनिक अवसरों और सम्मानजनक बाजार से जोड़ने की आवश्यकता है।
सरकारों की जिम्मेदारी है कि योजनाएँ फाइलों से निकलकर अंतिम व्यक्ति तक प्रभावी ढंग से पहुँचें। समाज की जिम्मेदारी है कि वह आदिवासी समुदाय को बराबरी के सम्मान के साथ स्वीकार करे। और हम सबकी जिम्मेदारी है कि विकास और संस्कृति के बीच ऐसा संतुलन बनाए रखें, जिसमें पहचान भी बचे और प्रगति भी आगे बढ़े।
आदिवासी समाज जीवंत स्वर है
भारत की आत्मा उसकी विविधता में बसती है और उस विविधता का सबसे प्राचीन, सबसे प्रकृति-निष्ठ और सबसे जीवंत स्वर आदिवासी समाज है। यदि हमें वास्तव में टिकाऊ विकास, पर्यावरण संरक्षण और संतुलित जीवन की दिशा में आगे बढ़ना है, तो आदिवासी समाज को बदलने से पहले हमें उससे सीखना होगा। क्योंकि सच यही है कि आदिवासी समाज को सशक्त करना केवल एक समुदाय का विकास नहीं, बल्कि भारत की आत्मा, उसकी सांस्कृतिक विरासत और आने वाले भविष्य को सशक्त करना है।



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