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श्राद्ध: स्मृतियों से आगे, विरासत तक

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क्या हमने अपने पूर्वजों के आदर्शों को अपनाया है (प्रवीण कक्कड़) श्राद्ध पक्ष का समय चल रहा है। सभी घरों में पूर्वजों को याद किया जा रहा है और उनकी स्मृति में दान-धर्म तथा भोजन के आयोजन हो रहे हैं लेकिन इन सबके बीच मेरे मन में एक सवाल भी है - क्या हम अपने पूर्वजों के आदर्शों और उनकी अच्छी बातों को सचमुच अपना पाए हैं? क्या उनकी स्मृति में भोजन कराने और दान देने के साथ-साथ हमने उनके जीवन-मूल्यों को अपने व्यवहार में जगह दी है? श्राद्ध पक्ष में ये सवाल केवल परंपरा निभाने के नहीं, अपने भीतर झाँकने के भी हैं। श्राद्ध हमारे पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर है। यह उन लोगों को याद करने का समय है, जिनके श्रम, संस्कार और फैसलों ने हमारे लिए जीवन की राह बनाई। लेकिन स्मृति तभी सार्थक होती है, जब वह हमारे वर्तमान को दिशा दे। तर्पण में अर्पित जल की तरह उनके अच्छे विचार भी हमारे आचरण में उतरें, तभी यह जुड़ाव अगली पीढ़ी तक पहुँचेगा। कृतज्ञता का अर्थ केवल कर्मकांड नहीं श्राद्ध पक्ष में श्रद्धा से किया गया भोजन, दान और तर्पण हमारी परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इनका अपना आध्यात्मिक और भावन...

पर्यटन: रास्ते जो हमें जीवन जीना सिखाते हैं

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घूमना सिर्फ़ जगह बदलना नहीं, नज़रिया बदलना है विश्व पर्यटन दिवस पर विशेष (प्रवीण कक्कड़) किसी अनजान शहर में रास्ता भटक जाना कभी-कभी जीवन का सबसे अच्छा सबक बन जाता है। हम किसी से दिशा पूछते हैं, अपनी योजना बदलते हैं और फिर उस जगह तक पहुँचते हैं, जिसे शायद सीधे रास्ते से कभी देख ही नहीं पाते। यात्रा का यही सौंदर्य है। वह हमें मंज़िल तक पहुँचाती है, लेकिन रास्ते में थोड़ा बदल भी देती है। 27 सितंबर को विश्व पर्यटन दिवस है। पर्यटन की चर्चा प्रायः सुंदर स्थलों, सुविधाओं और तस्वीरों तक सिमट जाती है। जबकि इसका सबसे गहरा प्रभाव यात्री के भीतर होता है। घर से निकलते समय हम अपने साथ अपनी आदतें, धारणाएँ और सोच लेकर चलते हैं। लौटते समय सामान लगभग उतना ही होता है, पर अनुभव कहीं अधिक। हमने कुछ नया देखा होता है, किसी अनजान व्यक्ति से बात की होती है और शायद अपने बारे में भी कुछ ऐसा जाना होता है जो रोज़ की दिनचर्या में कभी सामने नहीं आता। विकल्प खोजना हमें बढ़ाता है आगे यात्रा की पहली सीख है - सब कुछ हमारी इच्छा के अनुसार नहीं होगा। कभी मौसम बदल जाता है, कभी गाड़ी देर से आती है, तो कभी तय रास्ता बंद मिलत...

पहले मुफ्त की लत, अब नियमों का जाल

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चर्चा, चार्ज और चुनौती : क्या देश में UPI क्रांति का 'हनीमून पीरियड' खत्म हो चुका है?   प्रवीण कक्कड़ सुबह आँख खुलते ही दूध का पैकेट लिया QR कोड स्कैन किया। नुक्कड़ पर चाय पी QR स्कैन किया। दोपहर में सब्जी खरीदी, गाड़ी में पेट्रोल भरवाया, रेस्तरां में खाना खाया या रात को ऑनलाइन शॉपिंग की, बस जेब से मोबाइल निकाला, पलक झपकते ही 'बीप' की आवाज आई और भुगतान हो गया।हालत यह है कि दिन के अंत में जब आप वॉलेट खोलते हैं, तो गांधी जी की तस्वीरों वाले नोट जस के तस मुस्कुराते मिलते हैं, जबकि आपकी जेब से हजारों रुपये का डिजिटल लेन-देन हो चुका होता है। जिस यूपीआई ने हमारी उंगलियों को बिना सोचे-समझे खर्च करने की ऐसी जादुई आदत लगा दी... आज वही यूपीआई अचानक नियमों, चार्जेस और बहसों के एक अजीब चक्रव्यूह में उलझ गया है। आखिर मुफ्त क्रांति के दावों के बीच अचानक यह 'चर्चा, चार्ज और चुनौती' का दौर क्यों शुरू हुआ? आइए समझते हैं इस पूरे खेल के पीछे का सच। भारत की जेब कब मोबाइल में समा गई, हमें पता ही नहीं चला लेकिन अब इसी UPI को लेकर देश में नई बहस छिड़ी है। केंद्र सरकार ने 15 सितंबर को...

विघ्नहर्ता के चार वरदान, जो माँगने नहीं, अपनाने हैं

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श्रीगणेश से सीखिये सुनना, चुनना, बदलना और आगे बढ़ना  (प्रवीण कक्कड़) गणेश चतुर्थी पर हम भगवान श्री गणेश से सुख, समृद्धि, बुद्धि और विघ्नों से मुक्ति का आशीर्वाद माँगते हैं लेकिन इस बार एक प्रश्न स्वयं से भी पूछिए, जिस विघ्नहर्ता को हम अपने जीवन की बाधाएँ दूर करने के लिए पूजते हैं, क्या हमने कभी यह समझने की कोशिश की कि उनका स्वरूप हमें स्वयं बाधाओं से निपटने की कितनी बड़ी कला सिखाता है? श्री गणेश केवल आराधना के देवता नहीं, जीवन-प्रबंधन की अद्भुत प्रेरणा भी हैं। उनका स्वरूप मानो कहता है कि जीवन में हर समस्या के समाधान के लिए चमत्कार की प्रतीक्षा मत कीजिए, अपने भीतर सही गुण विकसित कीजिए। संयोग से पर्व है चतुर्थी का, इसलिए इस गणेश चतुर्थी पर विघ्नहर्ता से जीवन के चार सूत्र लेते हैं। ये चार वरदान ऐसे हैं, जिन्हें माँगना नहीं, अपनाना है। पहला सूत्र - शोर के युग में ‘सुनना’ सीखिए गणेशजी के विशाल कान हमें सबसे पहली और आज शायद सबसे जरूरी सीख देते हैं - बोलने से पहले सुनिए। आज हमारे पास अभिव्यक्ति के जितने साधन हैं, शायद सुनने का धैर्य उतना ही कम हुआ है। सोशल मीडिया पर हर व्यक्ति कुछ कहना चाह...

पीढ़ियाँ बदलती हैं, शिक्षकों की जिम्मेदारी नहीं

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Gen-Z और Gen-Alpha - नई पीढ़ी को दिशा देने की नई चुनौतियां (प्रवीण कक्कड़) शिक्षक साधारण नहीं होते, क्योंकि उनके सामने केवल विद्यार्थी नहीं, देश और समाज का आने वाला समय बैठा होता है। आज जिन बच्चों की सोच और व्यक्तित्व को वे आकार दे रहे हैं, कल वही परिवार, समाज और संस्थाओं की जिम्मेदारी संभालेंगे। उन्हीं में भविष्य के डॉक्टर, वैज्ञानिक, उद्यमी, अधिकारी, शिक्षक और जनप्रतिनिधि होंगे। इसलिए शिक्षक का प्रभाव एक विद्यार्थी तक सीमित नहीं रहता, वह उसके माध्यम से अगली पीढ़ी तक पहुँचता है। समय बदलता है, तकनीक बदलती है, पढ़ने-पढ़ाने के तरीके बदलते हैं और पीढ़ियाँ भी बदल जाती हैं, लेकिन शिक्षकों की जिम्मेदारी वही रहती है - नई पीढ़ी को अपनी क्षमताओं का श्रेष्ठ उपयोग करना सिखाना और सही दिशा देना। 2026 का शिक्षक दिवस इस जिम्मेदारी को नए संदर्भ में देखने का अवसर है। Gen-Z अब समाज और कार्यक्षेत्र में अपनी प्रभावी उपस्थिति दर्ज करा रही है और उसके पीछे Gen-Alpha तेजी से तैयार हो रही है। यह पीढ़ी इंटरनेट, स्मार्टफोन, सोशल मीडिया, एल्गोरिदम और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के बीच बड़ी हुई है। उसके पास जानकारी भी ...

कंक्रीट का विस्तार और प्रकृति का अनुशासन

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नेपाल की चेतावनी, भारत के लिए सबक  (प्रवीण कक्कड़) “विकास रोकना समाधान नहीं, विकास का भूगोल समझना और उसका सम्मान करना ही स्थायी समाधान है।” नेपाल में आई हालिया विनाशकारी बाढ़ को केवल पड़ोसी देश की मौसमी त्रासदी मानकर आगे बढ़ जाना गंभीर भूल होगी। यह हिमालय से आया वह स्पष्ट संदेश है, जिसे भारत के संवेदनशील पर्वतीय राज्यों से लेकर तेजी से फैलते आधुनिक महानगरों तक पढ़ा जाना चाहिए। संदेश सीधा है, प्रकृति विकास की विरोधी नहीं है, लेकिन उसके प्राकृतिक जलमार्गों को अवरुद्ध करके खड़ा किया गया विकास  कभी पूरी तरह सुरक्षित नहीं हो सकता। हिमालयी संकट और साझा चेतावनी 26 अगस्त को नेपाल के सीमावर्ती रासुवा क्षेत्र में आई विनाशकारी फ्लैश फ्लड ने भोटे कोशी और त्रिशूली नदी तंत्र को विकराल बना दिया। प्रारंभिक वैज्ञानिक आकलन ऊंचाई वाले क्षेत्र में बर्फ और चट्टानों के बड़े पैमाने पर धंसाव की ओर संकेत करते हैं। इस घटना ने हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियरों, ग्लेशियल झीलों और उनसे जुड़े GLOF यानी ‘ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड’ जैसे खतरों को फिर गंभीर चर्चा के केंद्र में ला दिया है। चिंता इसलिए भी बड़ी ह...

युवा सवालों से बदल रही राजनीति की दिशा

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जनआंदोलन : सड़क पर उठे सवाल बदल देते हैं सियासत ( प्रवीण कक्कड़ ) भारतीय राजनीति में इन दिनों एक दिलचस्प बदलाव दिखाई दे रहा है। अचानक युवा केवल भाषणों में देश का भविष्य नहीं रहा, वह राजनीतिक दलों के वर्तमान एजेंडे की प्राथमिकता बन गया है। सरकार कैंपस तक पहुँचने की रणनीति बना रही है, मंत्री विश्वविद्यालयों में युवाओं से संवाद करेंगे, सोशल मीडिया की भाषा और अंदाज बदल रहा है, राज्यों में Gen-Z से सीधे जुड़ने के कार्यक्रम तैयार हो रहे हैं। विपक्ष भी शिक्षा, परीक्षा, रोजगार और युवा आकांक्षाओं को अपनी राजनीतिक रणनीति के केंद्र में ला रहा है। सवाल है - आखिर ऐसा अचानक क्यों? इसका एक बड़ा जवाब कुछ सप्ताह पीछे दिल्ली के जंतर-मंतर पर मिलता है। प्रतियोगी परीक्षाओं की गड़बड़ियों, पेपर लीक, रोजगार और जवाबदेही के सवालों पर खड़े हुए Gen-Z आंदोलन ने भले अपना धरना समाप्त कर दिया हो, लेकिन जाते-जाते उसने राजनीतिक दलों के सामने एक नया चुनावी सच रख दिया - इस पीढ़ी को नजरअंदाज करना अब आसान नहीं है। दरअसल भारतीय लोकतंत्र में यह पहली बार नहीं हुआ। यहाँ चुनाव सरकार बदलते हैं, लेकिन कई बार आंदोलन राजनीति की दि...

संघर्ष की विरासत, सामर्थ्य का वर्तमान और संकल्पित भविष्य

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तिरंगे की छांव में 80वां स्वतंत्रता दिवस  यह सिर्फ छुट्टी का नहीं, अपनी आजादी को महसूस करने का दिन है (प्रवीण कक्कड़) 15 अगस्त 1947 केवल औपनिवेशिक शासन के अंत की तारीख नहीं है। यह सदियों के संघर्ष, असंख्य बलिदानों और करोड़ों भारतीयों की सामूहिक इच्छाशक्ति से अर्जित उस स्वाभिमान का प्रतीक है, जिसने भारत को अपने भाग्य का स्वयं निर्माता बनाया। तिरंगा केवल हमारी संप्रभुता का प्रतीक नहीं, बल्कि अतीत के संघर्ष, वर्तमान के सामर्थ्य और भविष्य की आकांक्षाओं को जोड़ने वाला राष्ट्रीय सूत्र है। आज जब देश अपना 80वां स्वतंत्रता दिवस और 79वीं वर्षगांठ मना रहा है, तब स्वतंत्रता दिवस को केवल एक छुट्टी का अवसर मत समझिए। यह दिन है ठहरकर अपनी आजादी को महसूस करने का, उन बलिदानों को याद करने का जिनकी बदौलत हम आज स्वतंत्र हैं। अपने आसपास जहां भी तिरंगा फहराया जा रहा हो, वहां जरूर पहुंचिए, राष्ट्रगान में शामिल होइए और स्वयं से एक सवाल पूछिए - जो भारत हमें हमारे पूर्वज सौंप गए, उसे और बेहतर बनाकर अगली पीढ़ी को सौंपने के लिए हम क्या कर रहे हैं? बलिदानों की नींव पर खड़ा भारत भारत की स्वतंत्रता किसी एक आंदोल...

सस्टेनेबल लिविंग का सबसे बड़ा उदाहरण हैं आदिवासी परंपराएँ

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  हजारों वर्षों की जीवंत सभ्यता का पर्याय आदिवासी समाज 9 अगस्त : विश्व आदिवासी दिवस पर विशेष ( प्रवीण कक्कड़ ) "जब आप किसी आदिवासी समुदाय को देखते हैं, तो आप केवल लोगों का एक समूह नहीं देखते, बल्कि हजारों वर्षों से प्रकृति के साथ संतुलित जीवन जीने वाली एक जीवंत सभ्यता को देखते हैं। उन्हें समझने के लिए केवल आँखें नहीं, हृदय की दृष्टि चाहिए।" 9 अगस्त को पूरा विश्व आदिवासी दिवस मना रहा है। इस वर्ष संयुक्त राष्ट्र ने इसकी थीम "स्वदेशी (आदिवासी) दाइयों का सम्मान: जीवन और कल्याण की सुरक्षा" निर्धारित की है। यह थीम केवल मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है, बल्कि आदिवासी समाज के उस पारंपरिक ज्ञान, जीवनशैली और प्रकृति के साथ उनके गहरे रिश्ते को सम्मान देने का संदेश भी देती है। वास्तव में यही वह ज्ञान है, जिसने सदियों से मानव और प्रकृति के बीच संतुलन बनाए रखा है। भारत के आदिवासी समाज को करीब से देखने का अवसर मिलने के कारण मुझे हमेशा लगा है कि यह थीम हमारे जनजातीय जीवन पर भी पूरी तरह सार्थक बैठती है। अलीराजपुर की धरती पर पहला कदम विश्व आदिवासी दिवस पर मेरा मन अनायास ही चा...

डिजिटल दुनिया में सब 'कनेक्टेड' हैं, फिर भी इतने अकेले क्यों?

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फ्रेंडशिप डे पर एक सवाल, जो हर रिश्ते से जवाब मांगता है (प्रवीण कक्कड़) अगस्त का पहला रविवार आते ही बाज़ार रंग-बिरंगे फ्रेंडशिप बैंड्स, उपहारों और ऑफर्स से सज जाते हैं। मोबाइल स्क्रीन शुभकामनाओं, रील्स और ट्रेंडिंग हैशटैग्स से भर जाती है। लेकिन इस उत्सव के बीच एक सवाल मन को बेचैन करता है - क्या डिजिटल युग में हम पहले से अधिक जुड़े हैं, या पहले से कहीं अधिक अकेले हो गए हैं? आज अधिकांश लोगों की कॉन्टैक्ट लिस्ट लंबी है, सोशल मीडिया पर सैकड़ों-हजारों दोस्त हैं, लेकिन क्या सचमुच हमारे पास ऐसा कोई है जिसे आधी रात को बिना झिझक फोन किया जा सके? जो हमारी सफलता पर सबसे ज्यादा खुश हो और असफलता में सबसे पहले हमारे साथ खड़ा दिखाई दे? शायद यही प्रश्न फ्रेंडशिप डे को केवल उत्सव नहीं, बल्कि आत्ममंथन का अवसर बना देता है। वर्ष 2026 में अंतरराष्ट्रीय मित्रता दिवस का वैश्विक संदेश "Embracing Diversity, Fostering Unity" (विविधता को अपनाना, एकजुटता को बढ़ावा देना) आज के समय की सबसे बड़ी जरूरत है। तकनीक ने देशों और महाद्वीपों की दूरियां कम कर दी हैं, लेकिन विचारों, भाषा, संस्कृति और सामाजिक पहचान क...

उम्मीदों के 'जंतर-मंतर' पर खड़ा भारत का युवा

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युवा आक्रोश : जिम्मेदारों की जवाबदेही और लोकतंत्र की ताकत (प्रवीण कक्कड़) दिल्ली का जंतर-मंतर इन दिनों केवल विरोध का एक पता नहीं, बल्कि देश के युवाओं की बेचैनी, उम्मीद और टूटते भरोसे का प्रतीक बन गया था। यहाँ खड़ा हर युवा मानो अपने मन में एक ही प्रश्न दोहरा रहा था, क्या उसका भविष्य भी आश्वासनों, आंदोलनों और इंतज़ार के इसी जंतर-मंतर में उलझकर रह जाएगा, या उसकी मेहनत को कभी निष्पक्ष अवसर भी मिलेगा? मेडिकल प्रवेश परीक्षा में कथित पेपर लीक और परीक्षा-व्यवस्था की अनियमितताओं के विरोध में शुरू हुआ आंदोलन जवाबदेही, पारदर्शी व्यवस्था और सम्मानजनक रोजगार की व्यापक मांग का स्वर बन गया। घटनाक्रम के बाद केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दिया और जंतर-मंतर का आंदोलन भी अपने इस चरण में शांतिपूर्वक पूर्ण हुआ। अब देश की निगाहें परीक्षा-तंत्र में अपेक्षित सुधारों के प्रभावी क्रियान्वयन पर टिक गई हैं। इस पूरे घटनाक्रम ने एक सकारात्मक संदेश भी दिया कि लोकतंत्र में शांतिपूर्ण संवाद, जनभागीदारी और जवाबदेही की प्रक्रिया आज भी प्रभावी है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने...

मेहनत पर 'माफिया' का राज, अनशन से 'इंसाफ' की आस

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युवाओं के सपनों पर ‘लीक’ का ग्रहण सोनम का सत्याग्रह और युवाओं के विश्वास की लड़ाई ( प्रवीण कक्कड़ ) भारत में एक मध्यमवर्गीय परिवार अपने बच्चों को विरासत में जमीन-जायदाद से अधिक शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं का सपना देता है। यही वह रास्ता माना जाता है , जो बेहतर भविष्य के द्वार खोलता है। लेकिन जब परीक्षा से पहले ही प्रश्नपत्र बाजार में पहुंच जाएं , भर्ती प्रक्रियाएं वर्षों तक अदालतों में उलझी रहें और लाखों युवाओं की उम्र तैयारी करते-करते निकल जाए , तब केवल एक परीक्षा नहीं , बल्कि पूरे तंत्र की विश्वसनीयता कटघरे में खड़ी हो जाती है। इसी चिंता के बीच दिल्ली के जंतर-मंतर से उठी एक आवाज देश का ध्यान अपनी ओर खींच रही है। लद्दाख के प्रसिद्ध शिक्षाविद् , नवाचारक और रेमन मैगसेसे पुरस्कार विजेता सोनम वांगचुक युवाओं के भविष्य और परीक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता की मांग को लेकर पिछले 21 दिनों से अनशन पर थे। शनिवार को स्वास्थ्य बिगड़ने पर पुलिस उन्हें जंतर-मंतर से सफदरजंग अस्पताल ले गई , जहां चिकित्सकीय निगरानी के बीच भी उनका अनशन जारी है। उनका यह कदम केवल एक परीक्षा या एक भर्ती प्रक्रिया का व...

स्मार्ट वॉटर पॉलिसी: जल-समृद्ध मध्य प्रदेश का रोडमैप

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स्पंज सिटी और वाटर क्रेडिट से जल सुरक्षा का नया खाका   (प्रवीण कक्कड़) मानसून की पहली तेज बारिश जब सूखी धरती को भिगोती है, तो ऐसा लगता है जैसे प्रकृति ने अपनी तिजोरी खोल दी हो। लेकिन कुछ ही दिनों में यही अमूल्य जल नदियों और नालों के रास्ते बहकर व्यर्थ चला जाता है। विडंबना यह है कि जिस मध्य प्रदेश की धरती से नर्मदा, चंबल, सोन, ताप्ती, बेतवा और केन जैसी जीवनदायिनी नदियां निकलती हैं, वहीं मालवा, बुंदेलखंड और निमाड़ के कई हिस्से गर्मी आते-आते जल संकट से जूझने लगते हैं। जलवायु परिवर्तन ने इस चुनौती को और गंभीर बना दिया है। कभी अतिवृष्टि, कभी अल्पवृष्टि और कभी असमान वर्षा का अनियमित चक्र। अब आवश्यकता जल प्रबंधन की है, जो हर बूंद को संसाधन मानकर उसके संग्रहण, पुनर्भरण, पुनर्चक्रण और उपयोग की पूरी श्रृंखला को एक साथ देखे। मध्य प्रदेश के लिए एक समग्र स्मार्ट वॉटर पॉलिसी इसी दिशा में निर्णायक कदम साबित हो सकती है।  कैस्केड स्टोरेज मॉडल   राज्य को अपने बड़े जलाशयों की क्षमता का अधिकतम उपयोग सुनिश्चित करना होगा। इंदिरा सागर, ओंकारेश्वर और अन्य प्रमुख बांध मानसून के दौरान विशाल मात्रा...